वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४६ ) वेदान्तसार । सब नाडियोंमें चलनेवाला सब शरीरमें रहनेवाले वायुको व्यान कहते हैं । ऊपरको चलनेवाला कण्ठस्थानमें रहनेवाले वायुको उदान कहते हैं । और भोजन कियेहुए अन्नके और पान कियेहुये जलादिके समीकरण करनेवाले वायुको समान वायु कहते हैं । परिपाक क्रियाद्वारा भोजनकरी हुई वस्तुका रुधिर वीर्य्य और पुरीषादि करनेका नाम समीकरण है॥ ४५॥ केचित्तु नागकूर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जयाख्याः पं- चान्ये वायवः सन्तीत्याहुः। तत्र नागः उद्गिरणकरः। कूर्मः निमीलनादिकरः कृकलः क्षुधाकरः । देव- दत्तः जृम्भणकरः । धनञ्जयः पोषणकरः । एतेषां प्राणादिष्वन्तर्भावात्प्राणादयः पंचैवेति केचित् । इदं प्राणादिपंचकं आकाशादिगतरजोंशेभ्यो मि- लितेभ्य उत्पद्यते ॥ ४६ ॥ (सं०टी० ) कपिलमतानुसारिणः क्रियाभेदेनान्येऽपि पंच वायवः संतीति वदंतीत्याह । केचित्त्विति । तेषामेव नामानि निर्दिशति नागेत्यादिना । नागेति । वेदांतिनस्तु ना- गादीनां प्राणादिष्वंतर्भावं वदंतीत्याह । एतेषां प्राणादिष्विति । प्राणादिवायुनामुत्पत्तौ कारणापेक्षायामाह एतदिति । अपंची- कृतपंचमहाभूतेभ्यो रजःप्रधानेभ्यः प्राणादयो जायन्त इत्यर्थः। ( भा०टी० ) सांख्यमतावलम्बी तो ऐसा कहते हैं कि नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त,धनञ्जय, यह और भी पाँच वायुहैं। उद्गिरण करानेवाले वायुको नाग कहते हैं । जिस वायुसे नेत्र