वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५८ ) वेदान्तसार । रादिविषयप्रयुक्तसुखदुःखभोगायतनत्वाच्च स्थूलशरीरत्वं इं- द्रियैरर्थोपलंभाज्जाग्रदवस्थात्वं घटत इत्यर्थः ॥ ५७ ॥ ( भा०टी० ) जैसे वन वृक्षसमूहकी समष्टि है और सं- म्पूर्ण वृक्ष वनकी व्यष्टि हैं और तालाब जलकी समष्टि है और जल तालावकी व्यष्टि हैं । इसीप्रकार यहाँभी चार प्रकारके शरीर एक जगह इकठे हुए समष्टि कहाते हैं और अलग अ- लग व्यष्टि कहाते हैं । इसी स्थूलशरीरकी समष्टिसे उपहित चैतन्य सर्व देहका अभिमानी अनेक प्रकारसे विराजमान वै- श्वानर और विराट्शब्दसे कहा जाता है । इस समष्टिरूप स्थूलशरीरको अन्नके विकारके निमित्त अन्नमयकोश कहते हैं और वही समष्टि स्थूलभोगका स्थान है इसकारण जाग्रत् शब्दसे कहा जाता है ॥ ५७ ॥ एतद्व्यष्ट्युपहितं चैतन्यं विश्वइत्युच्यते । सूक्ष्म- शरीराभिमानमपरित्यज्य स्थूलशरीरादिप्रवेष्टृ- त्वात् । अस्याप्येषा व्यष्टिः स्थूलशरीरं अन्नविका- रत्वात् अन्नमयकोषः । स्थूलभोगायतनत्वात् जाग्रदिति चोच्यते ॥ ५८ ॥ ( सं०टी० ) चतुर्विधं स्थूलशरीरं समष्ट्युपहितं चैतन्यं सप्रपंचमभिधायेदानीं तद्व्यष्ट्युपहितं चैतन्यं अभिधत्ते । एत- दिति । एतेषां चतुर्विधशरीराणां या व्यष्टिः तत्तच्छरीरव्य- क्तिः तदुपहितं चैतन्यं विश्व इत्युच्यत इत्यर्थः। तत्र हेतुमाह । सूक्ष्मशरीराभिमानमिति। सूक्ष्मलिंगशरीराभिमानमपरित्यज्य