भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 145 में से

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पृष्ठ 86

( ८६ ) वेदान्तसार । किंचिज्ज्ञत्वादिविशिष्टेन सहैक्यं वा वाक्यार्थो भवतीत्याशं- क्य दृष्टांतदार्ष्टांतिकयोः वैषम्यान्नैवमित्याह अस्मिन्नित्या- दिना । अस्मिन्निति । अस्मिंस्तत्त्वमसीति वाक्ये नीलो- त्पलमित्यादिवाक्यवत्संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थेन संग- च्छत इत्यर्थः। नीलोत्पलमितिवाक्यस्य संसर्गवैशिष्ट्यार्थप्रति- पादकत्वकल्पने विरोधाभावो दर्शयति । तत्र त्विति । नीलोत्प- लपदार्थयोर्गुणगुणिनोर्विशेषणविशेष्यभावसंसर्गस्य नीलगुणवि शिष्टोत्पलयोरैक्यस्य वा वाक्यार्थत्वांगीरकारे प्रत्यक्षादिप्र- माणांतरविरोधाभावात्तत्र तथा संगच्छत इति भावः । तत्त्व- मसीति वाक्ये तु तत्त्वंपदार्थयोःकिंचिज्ज्ञत्वादिविशिष्टजीवचै- तन्यस्य सर्वज्ञत्वादिविशिष्टेश्वरचैतन्यस्य चान्योन्यविशेषण- विशेष्यभावसंसर्गस्य तदुभयविशिष्टचैतन्यैक्यस्य वा वाक्या- र्थत्वांगीकारे प्रत्यक्षादिप्रमाणांतरविरोधात्पूर्वस्माद्वैषम्यं द- र्शयति । अत्र त्विति ॥ ७९ ॥ (भा०टी०) “नीलमुत्पलम्” इस वाक्यसे जैसा वा- क्यार्थ होता है । तिस प्रकार “तत्त्वमसि” इस वाक्यका वाक्यार्थ सङ्गत नहीं होता है क्यों कि “नीलमुत्पलम्” इस वाक्य में नील पदका अर्थ नीलगुण है और उत्पल पदका अर्थ उत्पल द्रव्य है यह दोनों शुक्लत्वादि और गुण और घटपटादिद्र- व्यके व्यावर्तक हैं इस कारण परस्पर विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध अथवा एक की दूसरे सङ्ग वाक्यार्थ सङ्गति होती है- तिस प्रकार “तत्त्वमसि” इस वाक्यमें सर्वज्ञत्व और किञ्चिज्ज्ञ-