वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६. वेणीसंहारं नाटकं दग्धुं विश्वं दहनकिरणैर्नोदिता द्वादशार्का- वाता वाता दिशि दिशि न वा सप्तधा सप्त भिन्नाः । छन्नं मेघैर्न गगनतलं पुष्करावर्तकाद्यैः पापं पापाः कथयत कथं शौर्यराशेः पितुर्मे ॥ ८ ॥ अन्वयः—विश्वम्, दग्धुम्, दहनकिरणैः, द्वादश, अर्काः न, उदिताः सप्तवाताः, सप्तधा, भिन्नाः, दिशि दिशि, न, वा, वाताः, पुष्करावर्तकाद्यैः, मेघैः, गगनतलं, न छन्नं, (तदा) हे पापाः, शौर्यराशेः मे, पितुः, पापं, कथं, कथयत ॥ ८ ॥ मम तातस्य साम्प्रतं न मृत्युकाल इत्याह—दग्धुं विश्वमिति । विश्वं = लोकं, दग्धुं = भस्मसात् कर्तुम्, दहनकिरणैः = दाहकरश्मिभिः, द्वाद- शार्काः = द्वादशसूर्याः, न उदितः = उदयं न प्राप्ताः, प्रलयंकाले धातृमित्रार्यमादयः सूर्या उदिता भवन्ति ते च साम्प्रतं न सन्ति तथा च कल्पान्तपर्यन्तस्थायिनो मम तातस्य कथं मृत्युः स्यादिति भावः । सप्त, वाताः = वायवः, सप्तधा भिन्ना सन्तः, दिशि दिशि न, वा, वाता = अवहन्, श्वसनादय एकोनपञ्चाशद्वाताः प्रलयकालिका न वाता इति भावः । पुष्करावर्तकाद्यैः = प्रलयकालिकैः पुष्करादिनामकैः, मेघैः = जलदैः गगनतलम् = आकाशमण्डलम्, न छन्नम् = आच्छादितम्, अन्तर्भावितण्यर्थः । तदा, हे पापाः = पापिनः, मे = मम, शौर्यराशेः = शूरतासमूहस्य पराक्रमिण इत्यर्थः । पितुः = जनकस्य, पापं = मृत्युम्, कथं कथयत = ब्रूत । प्रलयलक्षणाभावात् मम पितुः न मृत्युः सम्भवतीत्याकूतम् । मन्दाक्रान्ता छन्दः ॥ ८ ॥ बारहो सूर्य अपनी अग्निमयी किरणों से अखिलविश्व को भस्म कर देने के लिये उदित नहीं हुए हैं । प्रतिदिशाओं में उनचासों प्रकार के वायु तो प्रबल वेग से नहीं चल रहे हैं । पुष्करावर्तक मेघों से आकाश मण्डल भी आच्छादित नहीं है फिर अरे पापियों, महान् पराक्रमशाली मेरे पिता के लिए यह पापमयी वार्ता क्यों कह रहे हो ? अर्थात् प्रलयकाल का इस समय कोई भी लक्षण प्रतीत नहीं हो रहा है—न तो भगवान् भास्कर अपनी सम्पूर्ण कला से उदित हुए हैं और न झञ्झावात ही, जो प्रलय काल के समय ही हुआ करते हैं, चल रहे हैं अथवा घोर वर्षा करके संसार को प्रलयजलधि में निमग्न करा देने के लिए आकाश में मेघमण्डल भी नहीं विचरते हैं फिर प्रलयकाल के कोई भी लक्षण न मिलने से उसकी सम्भावना ही नहीं की जा सकती तो फिर पिता के विषय में यह सम्भावना हो नहीं सकती । क्योंकि पिता के वीर्य और पराक्रम के समक्ष इस सृष्टि के अन्तर्गत कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो उन्हें अन्तिम दशा को पहुँचा सके यदि है भी तो वह प्रलय काल, क्योंकि उसमें एक ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं बच सकता ॥ ८ ॥