वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ वेणीसंहारं नाटकं दुर्योधनः-आचार्यपुत्र, को विशेष आवयोरस्मिन्व्यसनमहार्णवे । पश्य- तातस्तव प्रणयवान्स पितुः सखा मे शस्त्रे यथा तव गुरुः स तथा ममापि । किं तस्य देहनिधने कथयामि दुःखं जानीहि तद् गुरुशुचा मनसा त्वमेव ॥ ३० ॥ कृपः - वत्स ? यथाह कुरुपतिस्तथैवैतत् । अश्वत्थामा - राजन्, एवं पक्षपातिनि त्वयि युक्तमेव शोकभारं लघू- कर्तुम् । किन्तु भृशम्, प्रक्षेप्तुम् अलमित्यन्वयः । व्यसनमहार्णवे = व्यसनं महार्णवः महासमुद्र इव, उपमितसमासः । अन्वयः-सः, तव, तातः, मे, पितुः, प्रणयवान्, सखा सः, शस्त्रे, यथा, तव, गुरुः, तथा, मम, अपि, ( गुरुः । तस्य, देहनिधने, दुःखम्, किम्, कथयामि, त्वम् एव, गुरुशुचा, मनसा, तद्, जानीहि ॥ ३० ॥ विशेषाभावं हेतुमाह - तातस्तवेति । सः = द्रोणः, तव, तातः = पिता मे = मम, पितुः, प्रणयवान् = स्नेहवान्, सखा = मित्रम्, एतेन पितृसदृशः सूचितः । सः = द्रोणः, शस्त्रे, यथा, तव, गुरुः = शिक्षकः, तथा, ममापि गुरुः तस्य, देहनिधने = मरणे, दुःखम् कि कथयामि = वच्मि कथनानाहं दुःखमिति भावः । त्वम्, एव गुरुशुचा = महाशोकेन, मनसा = अन्तः- करणेन् तद् = दुःखम्, जानीहि = बुद्ध्यस्व, समानदुःखभाजावावामिति भावः । वसन्ततिलकाछन्दः ॥ ३० ॥ दुर्योधन - आचार्यतनुजन्मन् ! हम दोनों ( दुर्योधन और अश्वत्थामा ) के इस दुःख के अगाध समुद्र में क्या वैषम्य है ? अर्थात् कुछ भी नहीं । देखिए- आपके पिता आपसे स्नेह करते थे तो मेरे पिता के भी मित्र थे । अर्थात् इस सम्बन्ध से मैं भी स्नेहभाजन हुआ । वे शस्त्रविद्या के जिस प्रकार आपके गुरु थे उसी प्रकार मेरे भी । उनके शरीरनाश के विषय में जो दुःख हो रहा है उसे क्या कहूँ आप अपने असीम शोकग्रस्त मन से ही समझ लीजिए अर्थात् आपके पिता के साथ मेरा भी आप ही का सा सम्बन्ध है अतः दुःख भी एक ही तरह का है आप अपनी वेदना से मेरी वेदना का अनुमान कर सकते हैं ॥ ३० ॥ कृप - पुत्र ! कौरवाधिनाथ ने जो कहा वह उसी प्रकार है । अश्वत्थामा - आपकी इस प्रकार की दयादृष्टि से शोकभार में न्यूनता होना स्वाभाविक ही है । परन्तु-