भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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पृष्ठ 171

१५० वेणीसंहारं नाटकं कर्णः—आः, का शक्तिर्वृकोदरस्य मयि जीवति दुःशासनस्य छाया- मप्याक्रमितुम् । युवराज, न भेतव्यं न भेतव्यम् । अयमहमागतोऽस्मि । ( इति निष्क्रान्तः । ) अश्वत्थामा—राजन् कौरवनाथ, अभीष्मद्रोणं सम्प्रति कौरवबलमालो- डयन्तौ भीमार्जुनौ राधेयेनैवविधेनान्येन वा न शक्यते निवारयितुम् । अतः स्वयमेव भ्रातुः प्रतीकारपरो भव । दुर्योधनः—आः, शक्तिरस्ति दुरात्मनः पवनतनयस्यान्यस्य वा मयि जीवति शस्त्रपाणौ वत्सस्य छायामप्याक्रमितुम् । वत्स, न भेतव्यं न भेतव्यम् । कः कोऽत्र भोः रथमुपनय (इति निष्क्रान्तः ।) ( नेपथ्ये कलकलः । ) अश्वत्थामा—(ससम्भ्रमं) मातुल, कष्टं कष्टम् । एष भ्रातुः प्रतिज्ञा- भङ्गभीरुः किरीटी समं दुर्योधनराधेयौ शरवर्षैरभिद्रवति । सर्वथा पीतं कौरवबलं = कुरुराजसैन्यम्, आलोडयन्तौ = मर्दयन्तौ, राधेयेन = राधाऽपत्य- कर्णेन, प्रतीकारपरः = उपायतत्परः । मातुल = कृपाचार्य, प्रतिज्ञाभङ्गभीरुरिति-यद्यहं दुर्योधनकर्णौ शरैराच्छादयामि तदा ताभ्यां निवा- कर्ण—अरे ! भीम में क्या सामर्थ्य है कि मेरे जीवित रहते हुए दुःशासन की छाया तक का स्पर्श करे । युवराज ! भय न करें, मैं आ ही पहुंचा (यह कहकर चल पड़ता है)। अश्वत्थामा—राजन्, कौरवेश्वर ! इस समय भीष्म और द्रोण से शून्य कौरवीय सेना का मन्थन करते हुए भीम और अर्जुन का प्रतिकार करने में कर्ण अथवा उसी प्रकार के किसी अन्य वीर में सामर्थ्य कहाँ ? अतः आप स्वयं भाई की रक्षा के लिए तत्पर हो जाइए । दुर्योधन—अरे ! दुष्ट वायुपुत्र भीम में अथवा अन्य किसी में क्या शक्ति है कि मेरे जीवित रहते हुए और हाथ में शस्त्र होते हुए अनुज दुःशासन की छाया का भी स्पर्श करे । भ्रातः ! न डरो, न डरो । अरे यहाँ कौन है ! मेरा रथ उपस्थित कर (यह कहकर चल देता है) । (नेपथ्य में कोलाहल) अश्वत्थामा—(सामने देखकर व्याकुलाहट के साथ) मामा ! हाय बड़े दुःख की बात है कि अर्जुन अपने भीम की प्रतिज्ञाभग्न हो जाने के भय से अमोघ शर की वर्षा करते हुए दुर्योधन और कर्ण की ओर दौड़ रहा है । हाय ! दुःख !! दुःख !!! अरे यह तो