वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ वेणीसंहारं नाटकं रणात्प्रद्रवन्ति बलानि । सूतः ( विलोक्य । ) कथमेष धवलचपलचामरचुम्बितकनककमण्डलुना शिखरावबद्धवैजयन्तीसूचितेन हतगजवाजिरनकलेवरसहस्रसम्मर्दविषमो- द्धातकृतकलकलकिङ्किणीजालमालिना रथेन शरवर्षस्तम्भितपरचक्रपराक्रम- प्रसरः प्रद्रुतमात्मबलमाश्वासयन्कृपः किरीटिनाभियुक्तमङ्गराजमनुसरति । हन्त, जातमस्मद्बलानामवलम्बनम् । ( नेपथ्ये कलकलानन्तरम् । ) शत्रुप्रत्ययास्तम्, बलानि–अवरुध्यन्तामित्यर्थः । धवलचपलचामरचुम्बितकनककमण्डलुना = स्वच्छं यच्चञ्चलचामरं तेन चुम्बितः कनकरुकमण्डलुः यत्र तेन, शिखरावबद्धवैजयन्तीसूचितेन=शिखरे अग्रभागे अवबद्धा या वैजयन्ती पताका तया सूचितेन, ज्ञातेन, हतगजवाजिरनकलेवरसहस्रसम्मर्द- कलेवराणि शरीराणि तेषां सम्मर्दनेन यो विषमोद्धातः तेन करणभूतेन कृतः कल- कलः महाध्वनिः येन किङ्किणीजालेन तन्माला यस्य तेन, इदं विशेषणत्रयं रथस्य, रथेनेत्यस्य करणत्वेन अनुसरणक्रियायामन्वयः । शरवर्षस्तम्भितपरचक्रपराक्रम- प्रसरः = बाणवर्षणेन स्तम्भितः शत्रुसमूहपराक्रमप्रसरः येन सः, प्रद्रुतं = धावितम्, आत्मबलं = स्वसैन्यम्, आश्वासयन् = सन्तोलयन्, कृपः = कृपाचार्यः, किरीटिना = अर्जुनेन अभियुक्तं = हननाथं लक्ष्यीकृतम्, अङ्गराजं = कर्णम्, अनुसरति = पश्चाद् गच्छति । हन्त इति हर्षे 'हन्त हर्षेऽनुकम्पायां वाक्यारम्भविषादयोः'रित्यमरः । होकर सेनायें तितर-बितर हो रही हैं उन्हें रोक रखिये । सूत—( देखकर ) जिस रथ के ऊपर सुवर्णकलश के साथ श्वेतवर्ण के सुन्दर चमर फरफरा रहे हैं, जिसके शिखराग्र भाग पर पताकायें फहरा रही हैं तथा युद्ध में मारे गये हाथी, घोड़े और मनुष्यों के असंख्य लोथों के ढेर से ऊँची-नीची भूमि पर टक्कर खाने से जिस रथ में बँधी हुई छोटी-छोटी घंटिकायें झङ्कृत होती रहती हैं इस प्रकार के रथ पर आरूढ होकर ये कृपाचार्य बाणों की वर्षा से शत्रुसैन्य की पराक्रमपूर्ण गति को जड़तुल्य बना देते हुए तथा भागती हुई अपनी सेना को धैर्य बँधाते हुए अर्जुन के साथ युद्ध करते हुए कर्ण की सहायता के लिये जा रहे हैं । प्रसन्नता की बात है कि हम लोगों की सेना के लिए कुछ आधार हो गया । ( नेपथ्य में कलकल ध्वनि के पश्चात् ) ।