भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 355 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 182

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १६१ दुर्योधनः- धिक्सूत, किं रथेन । केवलमरातिविमर्दसंघट्टसञ्चारी दुर्योधनः खल्वहम् तद्गदामात्रसहायः समरभुवमवतरामि । सूतः - देव, एवमेतत् । दुर्योधनः- यद्येवं किमेवं भाषसे । पश्य- बालस्य मे प्रकृतिदुर्ललितस्य पापः पापं व्यवस्यति समक्षमुदायुधोऽसौ । अस्मिन्निवारयसि किं व्यवसायिनं मां धिक् सूत = हे सूत त्वां धिक् । अन्वय - प्रकृतिदुर्ललितस्य बालस्य, पापम्, मे समक्षम्, पापः, उदायुधः, असौ, व्यवस्यति, अस्मिन्, व्यवसायिनम्, माम्, किम् निवारयसि, ते क्रोधः, न, नापि, करुणा, न च, लज्जा, अस्ति ॥ ५ ॥ बालस्येति । प्रकृतिदुर्ललितस्य = स्वभावतः चपलस्य, बालस्य = अल्पवय- स्कस्य, पापं = मरणम्, मे = मम, समक्षम्, पापः = पापी, उदायुधः = उद्यतशस्त्रः, असौ = भीमः, व्यवस्यति, अस्मिन् = भीमविषये, व्यवसायिनम् = उद्योगिनम् भीमहननार्थमिति भावः । मां = दुर्योधनम्, निवारयसि = अवहणत्सि, किम्, ते दुर्योधन-सूत ! तुझे धिक्कार है ! रथ ने क्या ? शत्रुओं की ठसाठस भीड़ के भीतर मैं [ दुर्योधन ] अकेला भ्रमण करने वाला हूँ । केवल गदा हाथ में लेकर मैं रणक्षेत्र में उतरने जा रहा हूँ । सूत-महाराज, आप ऐसे ही हैं [ इसमें सन्देह ही क्या ? ] दुर्योधन-यदि यही बात है तो फिर इस प्रकार की बात-चीत क्यों कर रहे हो ? अर्थात् जब तुम्हें मेरे पराक्रम के विषय में ज्ञान है तो फिर क्यों कह रहे हो कि घोड़े रथ नहीं खींच सकते । देखो- यह नीच [ भीमसेन ] हाथ में शस्त्र लेकर शैशवकाल से मेरे, आँखों के सामने लालित इस बालक (दुःशासन) के वध की चेष्टा कर रहा है। इस पापी का प्रतिकार करते हुए मुझे क्यों निषेध कर रहे हो। क्या तुम्हें (शत्रु पर) क्रोध नहीं आता ? क्या [बालक पर] दया का सञ्चार भी नहीं होता ? अथवा क्या तुम्हें [अपने कार्य पर] लज्जा भी नहीं लगती ? तात्पर्य यह कि दुश्शासन मेरा छोटा भाई है, अभी बच्चा है, लड़कपन से दुलारा गया है अतः लड़कपन के कारण द्रौपदी के केश और वस्त्रों को इसने खींचा है । फिर भी उसका बदला चुकाने के लिए यह भीमसेन शस्त्र लेकर उद्यत है । मैं उसका प्रतिकार करने के लिए तय्यार हूँ । तुम रोक रहे हो इसमें ऐसे दुरात्मा शत्रु पर तुम्हारे क्रोध की ज्वाला नहीं भड़कती है और न तुम्हें लड़के पर दया आती है और ११ वे०