वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
DevanagariHindipublished355 पृष्ठ
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१६६ वेणीसंहार नाटकं
दुर्योधनः-
घातिताशेषबन्धोर्मे किं राज्येन जयेन वा ॥ ९ ॥
(ततः प्रविशति शरप्रहारव्रणबद्धपट्टिकालङ्कृतकायः सुन्दरकः ।)
सुन्दरकः-अज्जा, अवि णाम इमस्सि उद्देसे सारहिदुइओ दिट्ठो
तुम्मेहिं महाराजदुज्जोहणो ण वोत्त (निरूप्य।) कहं ण कोवि मन्तेदि।
होदु। एदाण बद्धपरिअराण पुरीसाण समूहो दीसइ। एत्थ गदुअ पुच्छि-
स्सम्। (परिक्रम्य विलोक्य च।) कहं एदेवखु सामिणो गाढप्पहारहदस्स
घणसण्णाहजालदुब्भेज्जमुद्देहि कङ्कवत्तेहि हिअआदो सल्लाइं उद्धरन्ति।
ता ण क्खु एदे जाणन्ति। होदु। अण्णदो विचिणिइस्सम्। (अग्रतोऽव-
लोक्य, किञ्चित्परिक्रम्य।) इमे वखु अवरं प्पहददरा सङ्कदा वीरमणुस्सा
दीसन्ति। ता एत्थ गदुअ पुच्छिस्सम् (उपगम्य।) हंहा, जाणह तुम्हे
कस्सि उद्देसे कुरुणाहो वट्टइत्ति। कहं एदे वि म पेक्खिअ अहिअदरं
रोअन्दि। (दृष्ट्वा।) ता ण क्खु एदे वि जाणान्ति। हा अदिकरुण वखु
एत्थ वट्टइ। एसा बीलमादा समलविणिहद पुत्तं सुणिअ रत्तसुमणि-
वसणाए समगभूषणाए वहूए सह अणुमरदि। (सश्लाघम्।) साहु वीर-
मादे, साहु, अण्णस्सि वि जम्मन्तरे अणहदमुत्तआ हुविस्ससि। होदु।
अण्णदो पुच्छिस्सम्। (अन्यतो विलोक्य।) अअं अवरो बहुप्पहारजिह्-
दकाओ अंकिदव्रणवन्धो यव्व जाहसमूहो इमं सुण्णासणं तुलङ्गम उवा-
लहिअ रोइडि। णूण एदाणं एत्थ एत्थ सामी वावादितो ता ण क्खु
एदे वि जानन्दि। होदु। अण्णदो गदुअ पुच्छिस्सम। (सर्वतो विलोक्य।)
कहं सव्वो एव्व अवत्यागुरुवं व्यसणं अणुभवन्तो भाअधेअविसमसील-
दाए पज्जाउलो जणो। ता कं दाणीं एत्थ पुच्छिस्सम्। कं वा उवालहि-
घातिताशेषबन्धोः = हिंसितनिखिलवान्धवस्य, मे राज्येन किम्, वा = अथवा,
जयेन किम्, राज्यजययोः न किमपि प्रयोजनमित्याशयः। अनुष्टुब्छन्दः ॥ ९ ॥
शरप्रहारव्रणबद्धपट्टिकालङ्कृतकायः = शरप्रहारेण यद्व्रणम् तत्र बद्धा या
दुर्योधन-जब मेरे सभी परिवार की समाप्ति हो गई तो फिर राज्य और विजयलाभ में
क्या प्रयोजन ?॥ ९॥
(इसके अनन्तर बाणों के द्वारा छत अङ्गों पर पट्टी बाँधे हुए सुन्दरक का प्रवेश)।
सुन्दरक-हे भद्रपुरुषो ! क्या आप लोगों ने इस स्थान पर सारथि के साथ महाराज