वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
पृष्ठ 193, कुल 355 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः ] \qquad\qquad प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् \qquad\qquad १७३ पट्टेनविन्नांतसंधानतीक्ष्णमोक्षनिक्षिप्तशरधारावर्षिणाभियुक्तः स दुराचारो दुःशासन- वैरी मध्यमपाण्डवः ।) उभी-ततस्ततः । सुन्दरकः-तदो देव, उहअबलंमिलन्तदीप्पन्तक रितुरअपदादिसमुद्भूद- धूलिणिअरेण पल्लत्थगजघडासंघादेण अ वित्थन्तेण अन्धआरेण अन्धीकिदं उहअवलम् । ण हु गगणतलं अवलीअदि । (ततो देव, उभय वलमिलद्दीप्यमान- करितुरगपदातिसमुद्भूतधूलिनिकरेण पर्यस्तगजघटासंघातेन च विस्तीर्यमाणेनान्धका- रेणान्धीकृतमुभयवलम् । न खलु गगनतलं लक्ष्यते ।) उभी - ततस्ततः । सुन्दरकः-तदो देव, दूराकट्टिअधणुगुणाच्छोडनटङ्कारेण गम्भीरभी- सणेण जाणाअदि गज्जिदं पलअजलहरेण त्ति । (ततो देव, दूराकृष्टधनुर्गुणा- युद्धार्थं लक्ष्मोकृतः, दुराचारः = दुष्टः, मध्यमपाण्डवः = भीमः, कर्णो भीमेन सह युद्धार्थं सन्नद्ध इत्यर्थः । उभयवलमिलद्दीप्यमानकरितुरगपदातिसमुद्भूतधूलिनिकरेण = उभयसैन्ययोः मिलन्तो ये दीप्यमानहस्तिघोटकचरणगन्तारः तैः समुद्भूतः सञ्जातो यो धूलिनिकरः रजःसमूहः तेन, पर्यस्तगजघटासङ्घातेन = पर्यस्ता व्याप्ता या गजघटा हस्ति समूहः तस्याः सङ्घातेन, च विस्तीर्यमाणेने = विततेन, अन्धकारेण = तमसा, उभयवलं= कौरवपाण्डवसैन्यमन्धीकृतम्, गगनतलम् = आकाशमण्डलम् । दूराकृष्टधनुर्गुणाच्छोटनटङ्कारेण = दूरं यथा स्यात्तथा आकृष्टो यो धनुर्गुणः चाप- आदान और मोक्ष का पता नहीं चलता था । उन्होंने अगणित बाणों की झड़ी लगाते हुए उस दुष्ट मझले पाण्डव भीमसेन पर आक्रमण कर दिया । दोनों-तो फिर क्या हुआ ? सुन्दरक-तो फिर महाराज ! दोनों पक्षों की सेनाओं के हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकों के भिड़ जाने के कारण उठी हुई धूलराशि में और इधर-उधर फैले हुए हाथियों के झुण्ड से सर्वत्र विस्तृत अन्धकार से दोनों पक्ष की सेना अन्धी सी हो गई, पृथ्वी और आकाश का पता नहीं चलता था । दोनों-तो फिर ? सुन्दरक-जब धनुष की प्रत्यञ्चा [ डोरी ] पूरी तरह खींचकर छोड़ दी जाती थी तब उसकी गम्भीर ध्वनि के कारण त्रासजनक अन्धकार से विदित होता था कि प्रलयकालीन