भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १७९ दुर्योधनः—(साकूतम् ।) ततस्ततः । सुन्दरकः—तदा देव, तं तारिसं पेक्खिअ सत्तुणो समरव्वावारचउर- त्तणं। अविभाविअतूणीरमुहधणुग्गुणगमणागमणसरसंघाणमावखचदुलकर- अलेण कुमालविससेणेण वि सविसेसं पत्थुदं समलकम्म। (ततो देव, तत्तादृशं प्रेक्ष्य शत्रोः, समरव्यापारचतुरत्वमविभाविततूणीरमुखधनुर्गुणगमनागमनशरसंधानगो- ष्ठवचटुलकरतलेन कुमारवृषसेनेनापि सविशेषं प्रस्तुतं समरकर्म ।) दुर्योधनः—ततस्ततः । सुन्दरकः—तदो देवं, एत्थन्तरे, विमुक्कसमरव्वावारो मुहुत्तविस्सामिद वैराणुबन्धो दोण्णं वि कुरुराअपण्डवबलाणं 'साहु कुमालविससेण, साहु' त्ति किदकलअलो वीरलोओ अवलोइदु पडत्तो । (ततो देव, अत्रान्तरे विमुक्त- समरव्यापारो मुहूर्तविश्रामितवैरानुबन्धो द्वयोरपि कुरुराजपाण्डवबलयोः 'साधु कुमार- वृषसेन, साधु' इति कृतकलकलो वीरलोकोऽवलोकयितुं प्रवृत्तः ।) दुर्योधनः—(सविस्मयम् ।) ततस्ततः । अविभाविततूणीरमुखगमनागमनशरसंधानमोक्षवटुलकरतलेन=अविदितयोः निष- ङ्गमुखधनुर्गुणगमनागमनयोः शरग्रहणत्यागयोश्च चटुलं चपलं करतलं हस्तं यस्य तेन, सविशेषं = विशिष्टम्, समरकर्म = सङ्ग्रामव्यापारः, प्रस्तुतं = प्रारब्धम् । विमुक्तसमरव्यापारः = त्यक्तसङ्ग्रामक्रियः, मुहूर्तविश्रामितवैरानुबन्धः=मुहूर्तं विश्रामितः त्यक्तः वैरानुबन्धः शत्रुत्वप्रक्रिया येन सः । दुर्योधन—(उत्कण्ठापूर्वक) तो फिर ...... ? सुन्दरक—इसके अनन्तर महाराज ! शत्रु की इस प्रकार की युद्धक्रियापटुता को देखकर कुमार वृषसेन ने भी अपने चपल करों के द्वारा, जिनका तरकश के मुख तक जाना और फिर धनुष तक पहुँच जाना तथा बाणों को वेग के साथ फेंकना और उन्हें लौटा लेना प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था, विशेष रूप से संग्राम करना प्रारम्भ कर दिया । दुर्योधन—तो फिर ......? सुन्दरक—इसके अनन्तर इसी अवसर में संग्राम कार्य से पृथक् होकर क्षण मात्र के लिए शत्रुता को विश्राम देकर दोनों कौरव और पाण्डवों की सेना का सैनिकवर्ग शाबाश वृषसेन शाबाश ! इस प्रकार का कोलाहल करता हुआ देखने लगा । दुर्योधन—(आश्चर्य के साथ) अच्छा फिर क्या हुआ ?