भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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१८२ \t\t\t\t\tवेणीसंहारं नाटकं

सुन्दरकः-तदो देव, भणिदं स कुमालेन—'रे रे तादाहिक्खेवमुहल-
मज्झमपण्डव, मह सरा तुह सरीरं उज्झिअं अण्णस्सि ण णिवडन्ति' त्ति
भणिअ सरसहस्सेहि पण्डवसरीरं पच्छादिअ सिंहणादेण गज्जिदुं पउत्तो।
(ततो देव, भणितं स कुमारेण—'रे रे ताताधिक्षेपमुखर मध्यमपाण्डव, मम शरा-
स्तव शरीरानुज्झित्वान्यस्मिन्न निपन्ति' इति भणित्वा शरसहस्रैः पाण्डवशरीरं
प्रच्छाद्य सिंहनादेन गर्जितुं प्रवृत्तः ।)
दुर्योधनः- (सविस्मयम् ।) अहो, बालस्य पराक्रमो मुग्धस्वभावेऽपि ।
ततस्ततः ।
सुन्दरकः - तदो अ देव, तं सरसंपादं समवधूनिअ णिसिदसराभिवाद-
जातमण्णुणा किरीटिना गहिदा रहुच्छङ्गादो क्वणन्तकणककिङ्किणी जालझ-
ङ्कारविरािणी मेहोवरोहविमुक्कणहत्थलणिम्मला णिसिदसामलसिणिद्ध-
मुही विविहरणप्पहाभासुरभीसणरणिज्जदंसणा सत्ती विमुक्का कुमाला--
हिमुही । (ततश्च देव, तं शरसम्पातं समवधूय निशितशराभिघातजातमन्युना
'ताताधिक्षेपमुखर = ताताधिक्षेपेण पितृनिन्दया मुखर दुर्मुख, 'दुर्मुखे मुखरावद्ध-
मुखौ शक्लः प्रियंवदे' इत्यमरः । मध्यमपाण्डवः = अर्जुनः, युधिष्ठिरभीमयोरर्जुन,
स्याग्रजत्वात् नकुलसहदेवोश्चार्जुनो मध्यमपाण्डव उच्यते ।
शरसम्पातं = शरपतनम्, समवधूय=तिरस्कृत्य, निशितशराभिघातजातमन्युना=
तीक्ष्णबाणप्रहारोत्पन्नकोपेन किरीटिना, गृहीता = आत्ता अस्य शक्तिरित्यनेनान्वयः ।
रथोत्सङ्गात्=रथक्रोडात् रथमध्यादित्यर्थः । क्वणत्कनककिङ्किणीजालङ्कारविराविणी
क्वणन्ति शब्दायमानानि यानि कनककिङ्किणीजालानि सुवर्णघण्टिकासमूहः तेषां
झङ्कारेण विराविणी शब्दयित्री मेधोपरोधविमुक्तनभस्तलनिर्मला=मेघावरणरहि-
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सुन्दरक-इसके पश्चात महाराज ! कुमार [वृषसेन] ने कहा, 'अरे रे मेरे पिता की
निन्दा में रत मझला पाण्डुकुमार ! मेरे बाण तुम्हारे अङ्गों के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं
गिरेंगे' इस प्रकार कह कर अगणित बाणों से अर्जुन के शरीर को आच्छादित करते हुए
कुमार ने सिंह के गर्जन के सदृश गर्जन प्रारम्भ कर दिया ।
दुर्योधन-(आश्चर्य्य के साथ) भोले भाले बालक का पराक्रम भी कैसा प्रशंसनीय है।
सुन्दरक-इसके अनन्तर महाराज ! उन बाणों की झटियों को सहन कर के तीक्ष्ण
बाणों के प्रहार के कारण क्रुद्ध अर्जुन के द्वारा रथ के बीच से बजते सुवर्णनिर्मित घुंघुरुओं
की राशि के झङ्कार से झङ्कृत होती हुई, मेघों के अवरोध से रहित आकाशमण्डल की