वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
DevanagariHindipublished355 पृष्ठ
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१६० वेणीसंहारं नाटकं
हृदयं दह्यतेऽत्यर्थं कुतो दुःखं कुतो व्यथा ॥ ११ ॥
(इति मोहमुपगतः ।)
सूतः—समाश्वसितु समाश्वसितु महाराजः । (इति पटान्तेन वीजयति ।)
दुर्योधनः—(लब्धसंज्ञः ।) भद्र सुन्दरक, ततो वयस्येन किं प्रतिपन्न-
मङ्गराजेन ।
सुन्दरकः —तदो अ देव, तथाविधस्स पुत्तस्सदसणेण संगलिदं अस्सु-
जादं उज्झिअ अणवेक्खिदवरप्पहरणालोएण सामिणा अभिजुत्तो धणं-
जओ । तं अ सुतवहामरसुरिद्दोविदपवककम तह परिवक्कमन्तं पेक्खिअ
णउलसहदेवपञ्चालप्पमुहेहि अन्तरिदो धणंजअस्स रहवरो । (ततश्च देव,
तथाविधस्य पुत्रस्य दर्शनेन संगलितमश्रुजातमुज्झित्वाऽनपेक्षितपरप्रहरणेन स्वामि-
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हृदयम् = अन्तःकरणम् , परिभवाग्निना = परिभव एवाग्निः तेन, अत्यर्थं दह्यते =
भस्मसात्क्रियते, वेदान्तिमते अन्तःकरणस्य दुःखसमवायित्वेन अन्तःकरणरूपाधारस्य
दाहे सति आधारस्याभावेन आधेयदुःखस्याभावादुक्तं—‘कुतो दुःखं कुतो व्यथे’ति ।
यद्यपि ‘पीडा बाधा व्यथा दुःखमामनस्य प्रसृतिजम्’ इति कोशे व्यथादुःखयोः
पर्यायत्वेनोक्तेः पुनरुक्त्या कुतो दुःखं कुतो व्येत्युभयग्रहणमयुक्तं तथापि व्यथाशब्दः
शारीरिकदुःखे उपचर्यते । अत्र द्वितीयचरणे रूपकमलङ्कारः । पथ्यावक्त्रं
छन्दः ॥ ११ ॥
पटान्तेन = वस्त्रान्तेन, वीजयति = व्यजनक्रियां करोति ।
वयस्येन = मित्रेण, अङ्गराजेन, किम् प्रतिपन्नं = कृतम् ।
तथाविधस्य = मृत्युमुखं प्राप्तस्य, सङ्गलितं = प्रच्युतम्, उज्झित्वा = पृथक्कृत्य,
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प्रत्यक्षरूप से ही जला करता है फिर उन्हें दुःख और वेदना कहाँ अर्थात् दुःख और सुख
का सम्बन्ध तो अन्तःकरण से हुआ करता है यदि अन्तःकरण ही जल गया तो दुःख और
सुख की प्रतीति किसको होगी ? ॥ ११ ॥
(चेतनारहित हो जाता है)
सूत—धैर्य धरें, महाराज धैर्य धरें । (वस्त्राञ्चल से पंखा करता है)
दुर्योधन—(चैतन्य होकर) भाई सुन्दरक ! तो फिर मित्र कर्ण ने क्या किया ?
सुन्दरक—इसके अनन्तर महाराज ! इस प्रकार की दुर्दशा में पड़े हुए पुत्र के देखने
से झरते हुए अश्रुजलों को रोककर शत्रुओं के प्रहार की उपेक्षा करके स्वामी कर्ण ने अर्जुन
को आक्रान्त कर लिया । और उन्हें [कर्ण को] पुत्रवध के क्रोध से उदीप्त पराक्रम के