भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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पृष्ठ 231

पञ्चमोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् २११ अभिमुखमरीन्संख्ये घ्नन्तो हताः शतमात्मजा वहतु सगरेणोढां तातो धुरं सहितोऽम्बया ॥ ८ ॥ विपर्यये त्वस्याविपतेरुल्लङ्घितः क्षात्रधर्मः स्यात् । ( नेपथ्ये महान्कलकलः । ) गान्धारी - ( आकर्ण्य । सभयम् ! ) जाद, कहिं एदं हाहाकारमिस्सं तूर- रसिदं सुणोअदि । ( जात, कुत्रैतत् हाहाकारमिश्रं तूर्यरसितं श्रूयते । ) संजयः - अम्ब, भूमिरियमेवंविधानां भीरुजनत्रासजननी महानिना- दानाम् । सहस्रैः शिखासह्त्रैः कृतम् अर्चनं येषाम् ते, अरीन् = शत्रून्, अभिमुखम् = सम्मु- खम्, घ्नन्तः, = हिंसन्तः, सङ्ख्ये = रणे, शतम् आत्मजाः = पुत्राः, हता, अत एता- दृशकृतकृत्यपुत्रमरणेन न धैर्यत्यागः कार्य इति भावः । तत्र दृष्टान्तमुद्रया धैर्येण- राज्यभारग्रहणं कार्यमित्याह वहतु सगरेणेति । अम्बया, सहितः, तातः = पिता, सगरेण = सगरनामकसूर्यवंशीयनृपेण ऊढाम् , धुरम् = भारम् वहतु । यथा सगरना- मकनृपः कपिलक्रोधेन षष्टिसहस्रपुत्राणां विनाशेऽपि धैर्यमालम्ब्य चिरं राज्यं चकार तथैव तातो राज्यं करोत्विति भावः । अत्र निदर्शनालङ्कारः । हरिणी छन्दः ॥ ८ ॥ रसितम् = शब्दः । एवंविधानाम् = हाहाकारादिमिश्राणाम्, महानिनादानाम्, भीरुजनत्रास- युद्ध में समाप्त हो गए हैं । (अब) पिता जी (आप) माता जी के साथ सगर के द्वारा वहन किए हुए भार को वहन करें अर्थात् जिस प्रकार पृथ्वीमण्डल का शासन करते हुए, विविध प्रकार के ऐश्वर्यों का उपयोग करते हुए, शत्रुओं को पराजित करते हुए और राजन्यवर्ग से पूजित होते हुये सगर के साठ हजार पुत्र कपिल की शापज्वालारूपी युद्ध में विदग्ध होकर समाप्त हो गये । उपरान्त राजा सगर ने ही पृथ्वी के शासन का भार उठाया था वही भार अब आप उठायें । आपके पुत्रों में और सगर के पुत्रों में कोई भेद नहीं, बल और पुरुषार्थ में कोई भी किसी से न्यून नहीं है बस न्यूनता यही है कि सगर के साठ हजार पुत्र थे आपके सौ ही पुत्र हैं ॥ ८ ॥ इसके विपरीत करने से राजा के क्षत्रियधर्म की मर्यादा नहीं रह जायगी । गान्धारी- (सुनकर भयभीत होती हुई ) पुत्र ! यह हाहाकार त्राहि त्राहि की पुकार के साथ रणभेरी का नाद कहाँ से सुनाई पड़ रहा है । संजय-माताजी, यह तो भीरुलोगों को भय उत्पन्न करने वाले इस प्रकार के भीषण निर्घोषों का स्थान ही है ।