वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् २२३ कर्णो हतः सपदि तत्र शराः पतन्तु ॥ २२ ॥ सूत, अलमिदानीं कालातिपातेन । सज्जं मे रथमुपाहर । भयं चेत्पाण्डवे- भ्यस्तिष्ठ । गदामात्रसहाय एव समरभुवमवतरामि । सूतः-अलमन्यथा संभावितेन । अयमहमागत एव । (इति निष्क्रान्तः ।) धृतराष्ट्रः-वत्स, दुर्योधन, यदि स्थिर एवास्मान्दग्धुमयं ते व्यवसाय- स्तत्सन्निहितेषु वीरेषु सेनापतिः कश्चिदभिषिच्यताम् । दुर्योधनः-नन्वभिषिक्त एव । गान्धारी-जाद, कदरो उण सो जस्सि आसं ओलम्बिस्सम् । (जात, कतरः पुनः स यस्मिन्नाशामवलम्बिष्ये ।) नयैकशिष्यः = नये नीतौ एकशिष्यः प्रधानच्छात्रः, कर्णः, हतः, तत्र = अर्जुने, शराः सपदि = शीघ्रम्, पतन्तु । सम्प्रति भीमसेनं विहायार्जुनमेव हनिष्यामीति भावः । अत्र रूपकमलङ्कारः । वसन्ततिलका छन्दः ॥ २२ ॥ कालातिपातेन = समययापनेन समयस्य व्यर्थविनाशनेनेत्यर्थः । उपाहर = आनय । गदामात्रसहायः = गदामात्रं सहायः सहाय्यकर्ता यस्य सः । अन्यथा = पाण्डवेभ्यः भयं चेदिति, सम्भावितेन = सम्भावनया भावे क्तः । अभिषिच्यताम् = नियुज्यताम् । शास्त्र में आपका शिष्य था, मारा है शीघ्र ही उस पर वाणवृष्टि हो अर्थात् कर्ण के वध करने वाले पर शीघ्र ही प्रहार करूँगा ॥ २२ ॥ सूत ! अब समय व्यतीत करना नहीं चाहिए । मेरा रथ तैयार कर लाओ । यदि पाण्डुपुत्रों से डर लगता हो तो रहने दो । केवल गदा को सहायक बनाकर युद्धस्थल में जा रहा हूँ । सूत-प्रतिकूल विचार मत कीजिए । यह मैं आ ही पहुँचा (यह कह कर चला जाता है)। धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन ! यह तुम्हारा विचार यदि हम लोगों को संतप्त करने के लिए निश्चय हो चुका हो तो समीपवर्ती योद्धाओं में से किसी को सेनानायक पद पर अभिषिक्त कर दो (अर्थात् सेनापति बना दो) । दुर्योधन-अभिषिक्त कर लिया हूँ । गान्धारी-पुत्र ! वह कौन है जिस पर अपनी आशा को अवलम्बन करूँ अर्थात् जिसके आश्रित रहूँ ?