भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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२८६ वेणीसंहार नाटकं

द्रौपदी—(लब्धसंज्ञा।) वन्धेदु णाहो दुज्जोहणरुधिलाहेण हत्थेण दुस्सासणविमुक्कं मे केसहत्थम्। हञ्जे वुद्धिमदिए, तद पच्चक्ख एव्व णा- हेण पणिण्णादम्। (कञ्चुकिनमुपेत्य।) अज्ज, किं संदिट्टं दाव मे देवेण देव- कीणन्दणेण पुणो वि केसबन्धन आरम्भोअदुत्ति। ता उवणंहि मे पुप्फ- दामाइं। विरएहि दाव कवरीम्। करेहि भवदो णाराअणस्स वअणम्। ण क्खु सो अलीअं संदिसदि। अहवा किं मएसंतत्ताए भणिदम्। अचि- रगदं अज्जउत्तं अणुगमिस्सम्। (युधिष्ठिरमुपगम्य।) महाराज, आदीवअ चिदाम्। तुम वि खत्तधम्मअणुबन्धन्तो एव्व णाहस्स जीविदहरस्स अहि- मुहो होहि। अहवा जं दे रोअद। (बध्नातु नाथ! दुर्योधनरुधिरार्द्रेण हस्तेन दुःशासनविमुक्तं मे केशहस्तम्। हञ्जे बुद्धिमत्तिके, तव प्रत्यक्षमेव नाथेन प्रतिज्ञातम्। आर्य, किं सदृशं तावन्मे देवेन देवकीनन्दनेन पुनरपि केशबन्धनमारभ्यतामिति। तदुपनेय मे पुष्पदानि। विरचय तावत्कवरीम्। कुरुभगवतो नारायणस्य वचनम्। करोषीति अतिसन्धत्से, अल्पदुःखं करोषीति यावत्। तव भूयो भूयो मूर्च्छा भवति, मम तु न भवतीत्यल्पदुःखभागहमिति गूढाभिप्रायः। दुःशासनविमुक्तम् = दुःशासनेन विमुक्तम्, विमोचितम्, अन्तर्भाविनी ण्यथः। अथवा दुःशासनहेतुना विमुक्तम् अत्र पक्षे समासे क्लेशः, हेतुतृतीयान्तेन प्रतिपदो- क्तसमासविधानात्। केशहस्तम् = केशसमूहम्, नाथः = भीमः, दुर्योधनरुधिरार्द्रेण = दुर्योधनशोणितक्लिन्नेन, हस्तेन = करेण, बध्नातु। वीरप्रतिज्ञाया मिथ्या भवितुम- नार्हत्वादिति भावः। ससाक्षिणी प्रतिज्ञाऽस्ति न कपोलकल्पितेत्याह—तवेति। आर्य = कञ्चुकिन्! सन्दिट्ठम् = वाचिकं प्रेषितम्, सन्देशमेवाह = केशेति। तद् = तस्मात्, उपनय = आनय, पुष्पदानि = पुष्पगुच्छान्, कवरीम् = केशवेशम्। द्रौपदी—(होश में आकर) नाथ दुर्योधन के रक्त से लिपे हुए हाथ से मेरे केशपाश को, जिसे दुःशासन ने खोल दिया है, सँवारिये। अरी बुद्धिमत्तिके! तुम्हारे सामने ही स्वामी ने प्रतिज्ञा की है। आर्य! देवकी के पुत्र भगवान् वासुदेव ने क्या सन्देश दिया था— 'फिर भी केश सँवारना प्रारम्भ कर दीजिए?' अतः मेरे लिए कुसुमों की माला ला दे। मेरी वेणी सुधार दे। भगवान् वासुदेव के वचन की पूर्ति करो। वे असत्य सन्देश कदापि न देंगे। अथवा शोक से विदग्ध मैंने क्या कहा? शीघ्र ही स्वर्ग सिधारे हुए आर्यपुत्र के यहाँ मैं जाऊँगी। (युधिष्ठिर के समीप जाकर) महाराज, चिता जला दीजिए। आप भी क्षत्रियधर्म को ध्यान में रखते हुए स्वामी के प्राणहरण करने वाले के सम्मुख डटिए। अथवा जो आपको अच्छा लगे वह कीजिए।