वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 355 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् २६१ युधिष्ठिरः—महर्षे, न कश्चिच्छृणोति तावदावययोर्वचनम् । तदिन्धन- प्रदानेन प्रसादः क्रियताम् । राक्षसः—मुनिजनविरुद्धमिदम् । ( स्वगतम् ) पूर्णो मे मनोरथः । यावदनुपलक्षितः समिन्धयामि वह्निम् । ( प्रकाशम् । ) राजन्, न शक्नुमो वयमिहैव स्थातुम् । ( इति निष्क्रान्तः । ) युधिष्ठिरः—कृष्णे, न कश्चिदस्मद्वचनं करोति । भवतु । स्वयमेवाहं दाहसंचयं कृत्वा चितामादीपयामि । द्रौपदी -- तुवरदु तुवरदु महाराओ । ( त्वरतां त्वरतां महाराजः । ) ( नेपथ्ये-कलकलः । ) द्रौपदी— ( सभयमाकर्ण्य । ) महाराज, कस्स वि एसो तेजोवलदप्पिदस्स विसमो सङ्खणिग्घोसो सुणीअदि । अवरं वि अप्पिअं सुणिदुं अत्थि णिव्व आवयोः — द्रोपदीयुधिष्ठिरयोः, इन्धनप्रदानेन=काष्ठदानेन, प्रसादः = प्रसन्नता । इदम् = चितानिर्माणम्, मनोरथः = अभिलषितपाण्डवविनाशः अनुपलेखित = एतैरदृष्टः, इन्धनम् = काष्ठम्, समिन्धयामि = प्रज्वालयामि, स्थातुम् = अत्र स्थितिं कर्तुम् । निष्क्रान्तः = निर्गतः रङ्गमूमेरिति शेषः । दाहसञ्चयम् = काष्ठसञ्चयम् । कलकलः = आकस्मिको महान् शब्दः । विशुद्ध भरतवंश है वैसी ही उस वंश की गृहदेवियाँ उनके वियोग को सहन न करके प्राण छोड़ देती हैं । ] युधिष्ठिर—महात्मन् ! अब हम दोनों की बात भी कोई नहीं सुनता है । अतः (चितारोपणार्थ) काष्ठ प्रदान कर अनुगृहीत कीजिए । राक्षस—तपस्वियों के विपरीत यह कार्य है । ( मन में ) मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया । छिप कर चिता में आग लगा दूँगा । ( प्रकट रूप से ) अब मैं यहाँ ठहरने में असमर्थ हूँ ( चला जाता है ) । युधिष्ठिर—द्रौपदी ! मेरी बात कोई नहीं सुनता । अच्छा, न सुने । मैं स्वयं काष्ठ एकत्रित करके चिता में आग लगा लूँगा । द्रौपदी—शीघ्रता कीजिए, शीघ्रता कीजिए महाराज ! ( नेपथ्य में कलकल ध्वनि होती है । ) द्रौपदी— ( भयपूर्वक सुनकर ) महाराज ! किसी का, जिसे अपने बल और पराक्रम का अभिमान है, प्रचण्ड शङ्ख शब्द सुनाई पड़ रहा है । क्या आप और कोई दुःखद संवाद सुनने का विचार कर रहे हैं जिसके लिए विलम्ब कर रहे हैं ।