भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

३६ वेणीसंहारं नाटकं


भीमसेनः—किं संयतः । कञ्चुकी—नहि नहि, संयमितुमारब्धः । भीमसेनः—किं कृतं देवेन । कञ्चुकी--ततः स महात्मा दर्शितविश्वरूपतेजःसम्पातमूर्च्छितमवधूय कुरुकुलमस्मच्छिविरसन्निवेशमनुप्राप्तः कुमारमविलम्बितं द्रष्टुमिच्छति । भीमसेनः—( सोपहासम् । ) किं नाम दुरात्मा सुयोधनो भगवन्तं संय- मितुमिच्छति । ( आकाशे दत्तदृष्टिः । ) आः दुरात्मन्कुरुकुलपांसुल, एवमति- क्रान्तमर्यादे त्वयि निमित्तमात्रेण पाण्डवक्रोधेन भवितव्यम् । सहदेवः—आर्य, किमसौ दुरात्मा सुयोधनहतको वासुदेवमपि भगवन्तं स्वरूपेण न जानाति । भीमसेनः—वत्स, मूढः खल्वयं दुरात्मा कथं जानातु ! पश्य ।


दर्शितविश्वरूपतेजःसम्पातमूर्च्छितम् = दर्शितं यद्, विश्वरूपं विराट्शरीरम्, तस्य यत्तेजः तस्य यः सम्पातः, मेलनम्, तेन मूर्च्छितम्, कुरुकुलं दुर्योधनादीन् , अवधूय = तिरस्कृत्य । कुरुकुलपांसुल = कुरुकुलपापिष्ठ । स्वरूपेण = ईश्वररूपेण ।


भीमसेन—क्या पकड़ लिया ? कञ्चुकी—नहीं, पकड़ने के लिये तय्यार हुआ । भीम—भगवान ने क्या किया ? कञ्चुकी—वे महात्मा योगीश्वर कृष्ण अपने विश्वरूप के तेजपुञ्ज की चकाचौंध से कौरवों को मूर्च्छित तथा तिरस्कृत करके हम लोगों के शिविर पर चले आये हैं और आपको शीघ्र ही देखना चाहते हैं । भीम—( हँसता हुआ ) क्या दुरात्मा सुयोधन भगवान् वासुदेव को बन्धनमें डालना चाहता है ( आकाश की ओर अवलोकन कर ) अरे ! दुष्ट, कुरुकुलाङ्गार ! इस प्रकार तूने अपनी मर्यादा का उच्छेद कर दिया हैं कि तुम्हारे नाशार्थ पाण्डवों का क्रोध तो निमित्त कारण मात्र होगा ( अर्थात् तेरा पाप ही तुझे चाट जायगा ) । सहदेव—आर्य, क्या यह दुराचारी सुयोधन भगवान् वासुदेव के स्वरूप से परिचित नहीं है ? भीम—प्रिय भ्रातः ! वह मूढ़ पापात्मा कैसे जान सकता है, देखो :—