भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

द्वितीयोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् ६३ राजा--(सक्रोधम्, आत्मगतम् ) अलमिदानीमतः परमाकर्णनेन । भवतु तावत्तस्य परवनितावस्कन्दनप्रगल्भस्य माद्रीसुतहतकस्य जीवितमपह- रामि । ( किञ्चिद्गत्वा । विचिन्त्य ) अथवा इयमेव तावत्पापशीला प्रथममनु- शासनीया । ( इति निवर्तते । ) उभे--तदो तदो (ततस्ततः ।) भानुमती-तदा अज्जउत्तस्स पहादमङ्गलतूररवमिस्सेण वारविलासि- णीजणसंगीदरवेण पडिवोधिदह्मि । (तत आर्यपुत्रस्य प्रभातमङ्गलतूर्यरवमिश्रेण- वारविलासिनीजनसङ्गीतरवेण प्रतिबोधितास्मि ।) राजा--( सवितर्कम्, आत्मगतम् ।) किं नाम प्रतिबोधितास्मीति स्वप्न- दर्शनमनया वर्णितं भवेत् । अथवा सखीवचनादेव व्यक्तिर्भविष्यति । सुवदना--ज एत्थ अच्छाहिदं तं भाईरहीप्पमुहाणं णइणं सलिलेण अवहारिअदु । बह्माणं वि आसीसाए हुदाहुदिसुअन्धिणा ज्जलणेण अव- आर्यपुत्रस्य = पत्युः, प्रभातमङ्गलतूर्यरवमिश्रेण, राज्ञः प्रभाते जागरणार्थं वाद्य- वादने गणिकासंगीतञ्च भवत इत्याकूतम् । वारविलासिनी = वेश्या । प्रतिबोधिता = जागरिता । नामेति-नामशब्दोऽत्र विस्मये । प्रतिबोधितास्मीति-किमुक्तं प्रतिबोधिता- स्मीति, यन्मयाऽवगतं तन्नास्यास्तात्पर्यं किन्तु स्वप्नदर्शनम् । राजा--(क्रुद्ध होकर, स्वगत ) बस, अब इससे अधिक सुनने की कोई आवश्यकता नहीं । अच्छा अब परदार लम्पटशठ उस हतभाग्य माद्रीपुत्र को यमराज के घर का अतिथि बनाता हूँ । ( थोड़ा आगे बढ़कर फिर ठहर कर ) अथवा सर्वप्रथम इसी दुराचारिणी को दण्ड देना चाहिए । ( पीछे लौट आता है । ) दोनों सखियाँ-फिर क्या हुआ ? भानुमती-इसके अनन्तर आर्यपुत्र के उद्बोधननिमित्त प्रभातकालिक मृदङ्गध्वनि के साथ वैश्याओं के सङ्गीत से मैं जाग पड़ी । राजा-(तर्कित होकर ) क्या कहा-'मैं जाग पड़ी' ? स्वप्न का वर्णन इन्होंने किया होगा अथवा सखियों की बात से ही स्पष्ट हो जायगा । सुवदना-जो कुछ भी अमङ्गल हो उसे गङ्गाप्रभृति नदियों के जल से दूर कीजिए;