वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
DevanagariHindipublished355 पृष्ठ
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द्वितीयोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् ६५
माम्प्रत्याययितुं विमूढहृदयं दिष्ट्या कथान्तं गता ।
मिथ्यादूषितयानया विरहितं दिष्ट्या न जातञ्जगत् ॥ १३॥
भानुमती - हला, कहेहि किं एत्थ जिं वा असुहसूअअं त्ति । ( हंला,
कथय किमत्र प्रशस्तं किं वाऽशुभसूचकमिति । )
सखी चेटी च-( अन्योन्यमवलोक्य । अपवार्यं ) एत्थ णत्थि त्योअं वि
सुहसुअअम् । तदो अलोअं कधअन्ती पिअसहीए अवराहिणी भविस्सम् ।
सो दाणीं सिणिद्धो जणो जो पुच्छिदो परुसं वि हिदं भणादि । ( प्रकाशम् )
सहि, सव्वं एव्वं एदं असुहणिवेदनम् । ता देवदाणं पणामेण दुज्जादि-
जणपडिग्गहेण अ अन्तरीअदु । ण हु दाठिणो णउलस्स वा दंसणं अहि
सदवहं अ सिविणेय पसंसन्ति विअक्खणाओ। ( अत्र नास्ति स्तोकमपि
शुभसूचकम् । ततोऽलीकं कथयन्ती प्रियसख्या अपराधिनी भविष्यामि : स इदानीं
स्निग्धो जनो यः पृष्टः परुषमपि हितं भणति । सखि, सर्वमेवैतदशुभनिवेदनम् ।
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प्रत्याययितुम् = बोधयितुम्, कथा = वार्तालापः, अन्तं = समाप्तिम्, गता, दिष्ट्या
मिथ्यादूषितया = मिथ्याव्यभिचाररूपदोषयुक्तया, अनया, विरहितम् = शून्यं, जगत्=
संसारः न जातम् मया भ्रमात्सा न हतेति भावः । भाग्येनैतत्सर्वं जातमिति गूढाभि-
प्रायः । शार्दूलविक्रीडितं छन्दः । लक्षणमुक्तं प्रथमश्लोके ॥ १३ ॥
अत्र = स्वप्ने, प्रशस्तम् = शुभसूचकम् ।
स्तोकम् = अल्पम् । अलीकं = मिथ्या । अशुभसूचकमपि शुभसूचकमिति, कथ-
विष्यामि तदा मिथ्याकथनादपराधभागिनी भविष्यामीत्यर्थः । । स्निग्धः = स्नेहो
हितेच्छुरित्यर्थः । पृष्टः = स्वामिनेति शेषः । परुषं = निष्ठुरम् । साम्प्रतं श्रवणमात्रेण
बातचीत समाप्त हो गई, और यह भी पुण्य की बात है नहीं तो मुझसे यह व्यर्थ ही
कलङ्कित हो अपने प्राण विसर्जन कर देती और इससे वियुक्त होकर मैं अपने लिये संसार
को शून्य समझता ॥ १३ ॥
भानुमती-ऐ सखि कहो इस स्वप्न में कितना अंश अशुभ और कितना शुभ है ?
सखी और दासी-( एक दूसरे को देखकर और छिपाकर ) उसमें कुछ भी शुभ-
सूचक नहीं है, यदि असत्य भाषण करूंगी तो प्रिय सहेली की अपराधिनी हो जाऊँगी ।
अतः सुहृज्जन जो पूछे यदि उसके उत्तर में हित की बाते चाहे श्रोत्राभिराम न हो तो भी
कहनी चाहिए । सखि, यह स्वप्न तो सब रीति से अमंगल का हो सूचक है अतः देवताओं
के नमस्कार से दूर्वादल इत्यादि मांगलिक वस्तुओं के स्पर्श से अमंगल का शमन करना
चाहिए, क्योंकि दाँत वाले प्राणियों में चाहे न्यौला हो चाहे दूसरा कोई हो उसका स्वप्न
५ वे०