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विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

Vidura Niti Gita Press

महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished172 पृष्ठ

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पाँचवाँ अध्याय १२३

अकर्मण्य, बहुत खानेवाले, सब लोगोंसे वैर करनेवाले, अधिक मायावी, क्रूर, देश-कालका ज्ञान न रखनेवाले और निन्दित वेष धारण करनेवाले मनुष्यको कभी अपने घरमें न ठहरने दे ॥ ३५ ॥

कदर्यमाक्रोशकमश्रुतं च वनौकसं धूर्तममान्यमानिनम् । निष्ठुरिणं कृतवैरं कृतघ्नमेतान् भृशार्तोऽपि न जातु याचेत् ॥ ३६ ॥

बहुत दुखी होनेपर भी कृपण, गाली बकनेवाले, मूर्ख, जंगलमें रहनेवाले, धूर्त, नीचसेवी, निर्दयी, वैर बाँधनेवाले और कृतघ्नसे कभी सहायताकी याचना नहीं करनी चाहिये ॥ ३६ ॥

संक्लिष्टकर्माणमतिप्रमादं नित्यानृतं चादृढभक्तिकं च । विसृष्टरागं पटुमानिनं चाप्येतान् न सेवेत नराधमान् षट् ॥ ३७ ॥

क्लेशप्रद कर्म करनेवाला, अत्यन्त प्रमादी, सदा असत्य-भाषण करनेवाला, अस्थिर भक्तिवाला, स्नेहसे रहित, अपनेको चतुर माननेवाला—इन छः प्रकारके अधम पुरुषोंकी सेवा न करे ॥ ३७॥

सहायबन्धना ह्यर्थाः सहायाश्चार्थबन्धनाः । अन्योन्यबन्धनावेतौ विनान्योन्यं न सिध्यतः ॥ ३८ ॥

धनकी प्राप्ति सहायककी अपेक्षा रखती है और सहायक धनकी अपेक्षा रखते हैं। ये दोनों एक-दूसरेके आश्रित हैं, परस्परके सहयोग बिना इनकी सिद्धि नहीं होती ॥ ३८ ॥