विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ विदुरनीति
उत्पाद्य पुत्राननृणांश्च कृत्वा वृत्तिं च तेभ्योऽनुविधाय काञ्चित् । स्थाने कुमारीः प्रतिपाद्य सर्वा अरण्यसंस्थोऽथ मुनिर्वभूषेत् ॥ ३९ ॥
पुत्रोंको उत्पन्न कर उन्हें ऋणके भारसे मुक्त करके उनके लिये किसी जीविकाका प्रबन्ध कर दे, फिर कन्याओंका योग्य वरके साथ विवाह कर देनेके पश्चात् वनमें मुनिवृत्तिसे रहनेकी इच्छा करे ॥ ३९ ॥
हितं यत् सर्वभूतानामात्मनश्च सुखावहम् । तत् कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये ॥ ४० ॥
जो सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये हितकर और अपने लिये भी सुखद हो, उसे ईश्वरार्पणबुद्धिसे करे, सम्पूर्ण सिद्धियोंका यही मूलमन्त्र है ॥ ४० ॥
वृद्धिः प्रभावस्तेजश्च सत्त्वमुत्थानमेव च । व्यवसायश्च यस्य स्यात् तस्यावृत्तिभयं कुतः ॥ ४१ ॥
जिसमें बढ़नेकी शक्ति, प्रभाव, तेज, पराक्रम, उद्योग और निश्चय हैं, उसे अपनी जीविकाके नाशका भय कैसे हो सकता है? ॥ ४१ ॥
पश्य दोषान् पाण्डवैर्विग्रहे त्वं यत्र व्यथेयुरपि देवाः सशक्राः । पुत्रैर्वैरं नित्यमुद्विग्नवासो यशःप्रणाशो द्विषतां च हर्षः ॥ ४२ ॥