विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 172 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय
८१.
प्रह्लाद उवाच
अथ यो नैव प्रब्रूयात् सत्यं वा यदि वानृतम्।
एतत् सुधन्वन् पृच्छामि दुर्विवक्ता स्म किं वसेत् ॥ ३० ॥
प्रह्लादने कहा—सुधन्वन् ! अब मैं तुमसे यह बात पूछता हूँ—जो सत्य न बोले अथवा असत्य निर्णय करे, ऐसे दुष्ट वक्ताकी क्या स्थिति होती है ? ॥ ३० ॥
सुधन्वोवाच
यां रात्रिमधिविन्ना स्त्री यां चैवाक्षपराजितः।
यां च भाराभितप्ताङ्गो दुर्विवक्ता स्म तां वसेत् ॥ ३१ ॥
सुधन्वा बोला—सौतवाली स्त्री, जूएमें हारे हुए जुआरी और भार ढोनेसे व्यथित शरीरवाले मनुष्यकी रातमें जो स्थिति होती है, वही स्थिति उलटा न्याय देनेवाले वक्ताकी भी होती है ॥ ३१ ॥
नगरे प्रतिरुद्धः सन् बहिर्द्वारे बुभुक्षितः।
अमित्रान् भूयसः पश्येद् यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ ३२ ॥
जो झूठा निर्णय देता है, वह राजा नगरमें कैद होकर बाहरी दरवाजेपर भूखका कष्ट उठाता हुआ बहुत-से शत्रुओंको देखता है ॥ ३२ ॥
पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ॥ ३३ ॥
पशुके लिये झूठ बोलनेसे पाँच पीढ़ियोंको, गौके लिये झूठ बोलनेपर दस पीढ़ियोंको, घोड़ेके लिये असत्य भाषण करनेपर सौ पीढ़ियोंको और मनुष्यके लिये झूठ बोलनेपर एक हजार पीढ़ियोंको मनुष्य नरकमें ढकेलता है ॥ ३३ ॥