विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ विदुरनीति
हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन् ।
सर्वं भूम्यनृते हन्ति मा स्म भूम्यनृतं वदेः ॥ ३४ ॥
सोनेके लिये झूठ बोलनेवाला भूत और भविष्य सभी पीढ़ियोंको नरकमें गिराता है । पृथ्वी तथा स्त्रीके लिये झूठ कहने-वाला तो अपना सर्वनाश ही कर लेता है, इसलिये तुम भूमि या स्त्रीके लिये कभी झूठ न बोलना ॥ ३४ ॥
प्रह्लाद उवाच
मत्तः श्रेयानङ्गिरा वै सुधन्वा त्वद्विरोचन ।
मातास्य श्रेयसी मातुस्तस्मात्त्वं तेन वै जितः ॥ ३५ ॥
प्रह्लादने कहा—विरोचन ! सुधन्वाके पिता अङ्गिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं, सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है, इसकी माता भी तुम्हारी मातासे श्रेष्ठ है; अतः तुम आज सुधन्वासे हार गये ॥ ३५ ॥
विरोचन सुधन्वायं प्राणानामीश्वरस्तव ।
सुधन्वन् पुनरिच्छामि त्वया दत्तं विरोचनम् ॥ ३६ ॥
विरोचन ! अब सुधन्वा तुम्हारे प्राणोंका मालिक है । सुधन्वन् ! अब यदि तुम दे दो तो मैं विरोचनको पाना चाहता हूँ ॥ ३६ ॥
सुधन्वोवाच
यद्धर्ममवृणीथास्त्वं न कामादनृतं वदोः ।
पुनर्ददामि ते पुत्रं यस्मात् प्रह्लाद दुर्लभम् ॥ ३७ ॥
सुधन्वा बोला—प्रह्लाद ! तुमने धर्मको ही स्वीकार किया है, स्वार्थवश झूठ नहीं कहा है; इसलिये अब इस दुर्लभ पुत्रको फिर तुम्हें दे रहा हूँ ॥ ३७ ॥