विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८६ ) विटकर्तृकस्य काञ्चीपरिग्रहेण हठादन्यसाधारणनायिकासमाकर्षणरूपस्याप्रकृत- व्यवहारस्याऽभेदसमारोपात्समासोक्तिरलङ्कारः । भाषा चोलराज की कीर्त्ति रूपी वस्त्र को उतार देने की अर्थात् अपहरण करने की क्रीडा करने वाले उस राजा या कामुक ने अपनी भुजाओं के बल से काञ्ची- नगरी को जीत कर या करधनी पकड कर भय से या प्रेम से कापने वाली चोल राजा की राज्यलक्ष्मी को या कामिनी को अपनी ओर खींचा । अर्थात् जिस प्रकार कोई कामुक किसी कापत्ती हुई कामिनी की साडी छोडकर अपने हाथो मे उसकी करधनी पकड कर उस अपनी ओर खींचता है उसी प्रकार उस राजाने यश कमाने की इच्छा से अपन भुजबल से काञ्चीनगरी को जीत कर भय से कम्पित चोलराज की लक्ष्मी को अपनी ओर खींच लिया । चोलस्य यद्भीतपलायितस्य भालत्वचं कण्टकिनो वनान्ताः । अद्यापि किं वानुभविष्यतीति व्यपाटयन्द्रष्टुमिवाक्षराणि¹ ॥११६॥ अन्वयः वनान्ताः कण्टकिनः यद्भीतपलायितस्य चोलस्य भालत्वचम् अद्यापि (अयं) किं वा अनुभविष्यति इति अक्षराणि द्रष्टुम् इव व्यपाटयन् । व्याख्या वनान्ता वनप्रान्तस्था कण्टकिन कण्टकाकीर्णा वृक्षा यस्माद्राज्ञ आहवमल्ल- देवाद्भीत्या भयेन पलायितस्य सुतरा दूर गतस्य चोलस्य चोलदेशनृपस्य भालत्वच ललाटचर्म, अद्याप्यत परमपि चोलराजोऽय कि वा कीदृशान्यन्यदुःखान्यनु- भविष्यतीत्यक्षराणि ललाटलिखितानि द्रष्टुमिव व्यपाटयन् विदारितवन्त । अत्र वनान्तकण्टकवृक्ष-कर्तृकभालत्वग्विपाटने 'अद्यापि किं वाऽयमनुभविष्यतीत्यक्षर- दर्शनस्य प्रयोजनत्वेनोत्प्रेक्षणात्फलोत्प्रेक्षा । भाषा जगल के कण्टकी वृक्षा ने इस आहवमल्ल देव राजा के भय से भागने वाले चोल देश के राजा के ललाट के चमडे को मानो इसके भाग्य में अब और ¹ श्लोकोऽय बहुष्वलङ्कारग्रन्थेषूदाहरणार्थमुद्धृत ।