भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

( १० ) जिसके धनियों के ऊँचे २ मकानों की कतार पर जलने वाले असंख्य दीपो के कज्जल के समान आकाश दिखाई देता था । अर्थात् काला आकाश उन दीपो का धूवाँ मालूम होता था । निवर्त्तिताश्चन्दनलेपपाण्डुभिर्नतध्रुवां यत्र समुन्नतैः स्तनैः । मुखानिला एव कदर्थनक्षमा भवन्ति माने मलयाद्रिवायवः ॥२॥ " अन्वयः यत्र नतध्रुवां चन्दनलेपपाण्डुभिः स्तनैः निवर्त्तिता मुखानिलाः एव माने कदर्थनक्षमाः मलयाद्रिवायवः भवन्ति । व्याख्या यत्र पुरे नते वक्रे ध्रुवौ दृग्भ्यामूर्ध्वभागौ 'ऊर्ध्वं दृग्भ्यां भ्रुवौ स्त्रियां' इत्यमरः । यासां तास्तासामङ्गनानां चन्दनस्य लेपेन पाण्डुभि शुक्लवर्णैः समुन्नतैस्तुङ्गैः स्तनै पयोधरैर्निवर्त्तिता मुखान्निस्सृत्य स्तनैस्संघट्य पुन परावृत्ता मुखानिला एव माने मानावस्थायां कदर्थने व्यथोत्पादने मानभङ्गकरणे च क्षमा- समर्था मलयाद्रेर्वायवो दक्षिणानिला भवन्ति । मलयाद्रिवायुवद्विरहव्यथासंदीप- नक्षमा भवन्तीति भाव । अत्र रूपकालंङ्कार । भाषा जिस नगर की नारियां के मुख से निकलने वाले वायु ही चन्दन के लेप से श्वेत वर्ण उच्च कुचों से टकरा कर फैलते हुए, मानावस्था में विरह व्यथा को उत्पन्न करने में समर्थ मलयानिल ही हो जाते है । मलयानिल जिस प्रकार चन्दन वृक्षों के सम्पर्क से सुगन्धित होकर पहाड़ों से टकरा कर फैलते हुए अपनी सुगन्ध और शैत्य से विरह व्यथा कारण होते हैं वैसे ही नारियों के मुखानिल स्तन पर के चन्दन लेप से सुवासित व शीत होकर ऊँचे कठोर स्तनों से टकरा कर मन्दगति से फैलते हुए मानावस्था में उनके पतियों को विरह व्यथा कारक होकर उनका मान भङ्ग करने में समर्थ होते थे । क्षपाकरः कातररश्मिमण्डलः पुरन्ध्रिगण्डस्थलकान्तिसम्पदा । विकीर्णसंमार्जनभस्मरेणुना विभर्ति यस्मिन्मुकुरेण तुल्यताम् ॥३॥