विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११० ) भाषा हे मृगशावकनयनि ! तुम्हारे शरीर के अवयवों में कोई कुलक्षण नहीं दीख पड़ता है । किन्तु तुम्हारे में इस प्रकार की पुत्र रूपी फल की समृद्धि में प्रतिबन्धक मेरे ही पूर्वजन्म का पाप है, यह बात निश्चित है । अवीक्षमाणा सदृशं गुणैर्मम क्रमांगता श्रीरियमाश्रयं पुरः । पयोधिमध्यस्थितपोतकूपक-स्थिता शकुन्तीव मुहुः प्रकम्पते ॥३१॥ अन्वयः क्रमांगता इयं श्रीः मम गुणैः सदृशम् आश्रयं पुरः अवीक्षमाणा पयोधिमध्यस्थितपोतकूपकस्थिता शकुन्ती इव मुहुः प्रकम्पते । व्याख्या क्रमेण कुलक्रमेणाऽऽगता प्राप्तेयं श्री राज्यलक्ष्मी मम गुणैः शौर्यादिभिः सदृश समानमत एव योग्यमाश्रयमाश्रयभूतं स्थानं पुरोऽग्रेऽवीक्षमाणाऽनवलोकयन्ती पयोधेः समुद्रस्य मध्ये मध्यभागे स्थितो विद्यमानः पोतो यानपात्रं ‘यानपात्रे शिली पोतः' इत्यमरः । तस्य कूपको गुणवृक्षको नौमध्यस्थितरज्जुबन्धनदण्डः तस्मिन् स्थितोपविष्टा शकुन्तीव पक्षिणीव मुहुरभीक्ष्णं ‘मुहुः पुनः पुनः शश्वद- भीक्ष्णमसकृत्समाः' इत्यमरः । प्रकम्पते बिभेति । स्थिरमाश्रयमपश्यमाणा स्वस्थितेस्सन्देहास्पदत्वाद्रीतेत्यर्थः । अत्रोपमालङ्कारः । भाषा कुल परम्परागत यह राज्य श्री, मेरे गुणों के ऐसे गुण वाले आश्रय को आगे न देखकर बीच समुद्र में विद्यमान जहाज के मस्तूल पर बैठी चिड़िया के समान रह रह कर काँपती है । अर्थात् स्थिर आश्रय न देखकर अपने अस्तित्व के सन्देह से भयभीत होती है । प्रियप्रमादेन विलाससम्पदा तथा न भूषाविभवेन गेहिनी । सुतेन निर्व्याजमलीकहासिना यथाङ्कपर्यङ्कगतेन शोभते ॥३२॥