विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५४ ) कान्ति, मानो उस बालक के भीतर प्रविष्ट होकर उसके स्वाभाविक मुसकान रूप सफेद चन्द्रिका के रूप में फिर बाहर निकलती हुई राजा के नेत्रों के आनन्दोत्सव को सूचित करने वाली पताका थी। अर्थात् राजा को बालक के अकारण स्वाभाविक स्मित से अत्यन्त हर्ष होता था। मुष्टिप्रविष्टारुणरत्नदीप-प्रभालता तस्य समुल्लसन्ती । विपक्षकण्ठक्षतजानुलिप्ता कृपाणलेखा सहजेव रेजे ॥५॥ अन्वयः तस्य मुष्टिप्रविष्टारुणरत्नदीपप्रभालता समुल्लसन्ती सती विपक्षकण्ठ- क्षतजानुलिप्ता सहजा कृपाणलेखा इव रेजे। व्याख्या तस्य बालकस्य मुष्ट्यो. प्रविष्टा प्राप्ता यारुणा रक्तवर्णा रत्नदीपाना प्रभारूपिणी लता कान्तिवल्ली सा समुल्लसन्ती सुशोभिता सती विपक्षाणां शत्रूणां कण्ठारुतेषा क्षतजं रुधिरं तेनाऽनुलिप्ताऽनुरञ्जिता सहजा सहैवोत्पन्ना स्वाभाविकी जन्मसिद्धा कृपाणलेखेव खड्गलेखेव रेजे समलङ्कृताऽऽसीत् । बालकमुष्टि- प्रविष्टरत्नदीपरक्तवर्णकान्ति शत्रुक्ण्ठरुधिरानुलिप्तसहजकृपाणलेखेव शुशुभे इति भाव । भाषा उस बालक की मुट्ठी मे प्रवृष्ट रत्नदीप की लाल रग की कान्ति, शत्रुओ के कटे हुए गलो के खून से रानी, जन्म सिद्ध, साथ ही में उत्पन्न तलवार की धार के ऐसी शोभित होती थी। त्यक्त्वोपविष्टान्न्यदसौ कुमारः समुत्थितानां सविधे जगाम । आगामि तेनाधिकमुन्नतात्मा नीचेषु वैमुख्यमिवाचचक्षे ॥६॥ अन्वयः यन् असौ उन्नतात्मा कुमारः उपविष्टान् त्यक्त्वा समुत्थितानां सविधे जगाम तेन नीचेषु आगामि अधिकं वैमुख्यम् आचचक्षे इव।