विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५१ ) रहने से पृथ्वी का बोझ कम होकर, तुम्हारा भूभार कम होने से तुम्हें जो मिलता था यह अब उस राजा के मर जाने से तुम्हें प्राप्त न हो सकेगा शेष ! हे नागराज ! राजा आहवमल्लदेव के मर जाने से पृथ्वी का अधिक होकर उससे पीसे जाने के कष्ट से तुम्हारा मांस सूख कर हड्डिय अवशिष्ट रह जाएंगी । दिग्गजास्त्यजत स्वैर-क्रीडाविहरखादरम् । संभूय भूयः सर्वेऽपि धारयन्तु धरामिमाम् ॥७५॥ अन्वयः हे दिग्गजाः स्वैरक्रीडाविहरखादरं त्यजत सर्वे अपि भूयः संभूय इमां धरां धारयन्तु । व्याख्या हे दिग्गजाः ! हे दिक्कुञ्जराः ! स्वैरं स्वच्छन्दं यथास्यात्तथा यत्क्रीडासु विहरणं विहारार्थं संचलनं तस्मिन्नादरं स्नेहं त्यजत मुञ्चत । सर्वेऽपि भवन्त- स्सकला भूयः पुनरपि शत उत्पत्तिकालात्प्रागिव संभूय मिलित्वेमां धरां पृथ्वीं धारयन्तु वहन्तु । इदानीं युष्माकं पृथ्वीभारवहनकर्मणि सहायको राजाऽऽहव- मल्लदेवो भुवं परित्यज्य परलोकं गत इति भावः । भाषा हे दिग्गजो ! राजा आहवमल्लदेव के रहने से पृथ्वी स्थिर थी इसलिये तुम लोग आनन्द से स्वच्छन्द क्रीडा में घूमते थे । किन्तु अब राजा आहव- मल्लदेव पृथ्वी छोड़ कर परलोक को सिधार गये हैं, इसलिये अपना स्वच्छन्द क्रीड़ा प्रेम छोड़ो और सब मिलकर इस पृथ्वी को सम्हालो । बाहुराहवमल्लस्य सुवर्णस्तम्भविभ्रमः । पुरन्दरधुरां धर्तुं धात्रा व्यवहितः कृतः ॥७६॥ अन्वयः धात्रा सुवर्णस्तम्भविभ्रमः आहवमल्लस्य बाहुः पुरन्दरधुरां धर्तुं व्यव- हितः कृतः ।