विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२४ ) कठोरशब्देन निर्भरमिव व्याप्तमिव व्यराजताऽजायत । दुन्दुभिध्वनिधैरावत- डिण्डिमध्वनित्वस्योत्प्रेक्षणादुत्प्रेक्षालङ्कारः । भाषा दिग्गजों के कानों को बहिरा कर देने वाले इस चोल राजा की तुरहियों के भयंकर शब्दों से मानो ऐरावत के नगाड़े की ध्वनि से या नगाड़े के समान शब्द से आकाश गूंज उठा हो, ऐसा प्रतीत होने लगा । सर्वतः श्रवणभैरवस्फुरद्—दुन्दुभिप्रतिरवापदेशतः । सस्वनं द्विरदवृन्दघट्टनादस्फुटन्निव दिगन्तभित्तयः ॥६४॥ अन्वयः सर्वतः श्रवणभैरवस्फुरद्दुन्दुभिप्रतिरवापदेशतः द्विरदवृन्दघट्टनात् दिगन्तभित्तयः सस्वनम् अस्फुटन् इव । व्याख्या सर्वत सकलेषु प्रदेशेषु श्रवणेभ्य कर्णेभ्यो भैरवा भयानका ये स्फुरन्त प्रकटीभवन्तो दुन्दुभीना भेरीणा प्रतिरवा प्रतिध्वनयस्तेषामपदेशतो व्याजाद् द्विरदाना गजाना वृन्द्वानि समूहास्तेषा घट्टनात्सपर्पणाच्च दिशामन्ता दिगन्तास्तेषा दिगन्तप्रदेशाना भित्तय कुड्यानि 'भित्ति' स्त्री कुड्यम्' इत्यमर । सस्वन सशब्दमस्फुटन्निवाऽपतन्निव विदारिता इव जाता इति भाव । अत्रोत्प्रेक्षालङ्कार । भाषा चारो ओर जोर २ से बजने वाली भेरियो के वर्णकटु प्रतिध्वनियो के भिय से और हाथियों के समूहों के परस्पर धक्कों से मानो दिगन्तप्रदेशों की दीवारें शब्द करती हुई फट रही थी । कर्णतालपवनोर्मिशीतलैः सिञ्चति स्म करशीकराम्बुभिः । दिग्गजानिव भयेन मूर्च्छितांस्तस्य वारणपरम्परा पुरः ॥६५॥ अन्वयः तस्य वारणपरम्परा कर्णतालपवनोर्मिशीतलैः करशीकराम्बुभिः पुरः भयेन मूर्च्छितान् दिग्गजान् सिञ्चति स्म इव ।