भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

( ३२६ ) सूर्य को जो रास्ते का भ्रम न हुआ अर्थात् भुलावा न पड़ा, इसका कारण, हाथियों पर के झण्डो की झण्डियों के हिलते रहने से, उसकी हवा से धूलि का हट जाना ही है । अर्थात् झण्डियों के, खूब ऊपर फड़फड़ाते रहने से उसकी हवा से धूलि के हट जाने से सूर्य को साफ २ मार्ग दिखाई देता था । क्षोणिरेणुमिपतः सदाध्वगः स्यन्दने रचयति स्म भास्करः । पश्चिमाद्रिविषमस्थलीभुवां पूरणार्थमिव संग्रहं मृदः ॥६७॥ अन्वयः सदाध्वगः भास्करः क्षोणिरेणुमिषतः पश्चिमाद्रिविषमस्थलीभुवां पूरणार्थम् इव स्यन्दने मृदः संग्रहं रचयति स्म । व्याख्या सदा निरन्तरमध्वनि मार्गे गच्छतीति सदाध्वगः सदैव गमनशीलः पान्थ इत्यर्थः । 'अध्वनीनोऽध्वगोऽध्वन्यः पान्थः पथिक इत्यपि' इत्यमरः । भास्करः सूर्यः क्षोणेः पृथिव्या रेणुर्धूलिस्तस्य मिषतो व्याजात् पृथ्वीधूलिव्याजात् पश्चिमाद्रिः पश्चिमपर्वतस्तस्य विषमा उन्नतानताः स्थलयो भूमिभागास्तासामस्ताचलस्थि- तगर्तानां पूरणार्थमिव भरणार्थमिव समीकरणार्थमित्यर्थः । स्यन्दने स्वरथे मृदो मृत्तिकायास्संग्रहमेकत्रीकरणं रचयति स्म सम्पादयति स्म । अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः । भाषा सदैव चलते रहने वाला सूर्य, पृथ्वी की धूलि के बहाने से मानो पश्चिमाचल अर्थात् अस्ताचल की ऊंची नीची जमीन को भर कर समथल बनाने के लिये अपने रथ पर मिट्टी एकत्रित कर रहा था । नन्दनद्रुमनिकुञ्जपुञ्जितैः पांसुभिः कुसुमधूलिवासितैः । चौर्यकेलिशयनोपयोगतस्तुष्यति स्म सुरपांसुलाजनः ॥६८॥ अन्वयः सुरपांसुलाजनः कुसुमधूलिवासितैः नन्दनद्रुमनिकुञ्जपुञ्जितैः पांसुभिः चौर्यकेलिशयनोपयोगतः तुष्यति स्म ।