विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६२ ) सव्रणचरणा भूमौ शरीरस्य सम्पूर्णभारेण सुतरां पदं न निदधत इति । प्रमादिषु प्रमादप्रसक्तेष्वनयहितेषु जनेषु तु सुखेन पदनिक्षेपणं किमुत वक्तव्यम् । अर्थात् प्रमादिषु नीतिरहितेषु तु लक्ष्म्याः प्रेमप्रवणत्वमत्यन्तमसम्भाव्यमितिभावः । अत्र पादपल्लवे खड्गधारा-विरहण-जन्यव्रण-सहितत्वस्फोटकंटककोटिकसंभावना- दुत्प्रेक्षालङ्कारः । भाषा सैकडो योद्धाओ की तीखी खड्गधाराओं पर घूमने से मानो जिसके चरणों में घाव हो गए है ऐसी लक्ष्मी, नीति युक्त कार्य करने वाले राजाओ के पास भी शरीर का पूर्ण बोझा देकर अर्थात् सर्वतो भावेन अपना पद नही रखती अर्थात् स्थान ग्रहण नही करती । अनीति युक्त कार्य करने वाले प्रमादियो के पास लक्ष्मी के निवास के सम्बन्ध में कहना ही क्या है ? अर्थात् प्रमादियो के पास तो लक्ष्मी आ ही नही सकती । जिसके पावों में घाव रहता है वह स्वभाव से ही अपने चुटीले पाव पर शरीर का कुल बोझा देकर कभी नही चलता है । जख्मी पाँव वाली लक्ष्मी इसी से नीति निपुणो के पास भी अपने पाव पर शरीर का पूरा बोझा देकर नही रहती अर्थात् सर्वतो भावेन नही रहती । अवतरति मतिः कुपार्थिवानां सुकृतविपर्ययतः कुतोऽपि तादृक् । झटिति विघटते यया नृपश्रीस्तटगिरिसंघटितेव नौः पयोधेः ॥२६॥ अन्वयः कुपार्थिवानां सुकृतविपर्ययतः कुतः अपि तादृक् मतिः अवतरति यया नृपश्रीः पयोधेः तटगिरिसंघटिता नौः इव झटिति विघटते । व्याख्या कुपार्थिवानां भिन्नचरित्राणां नृपाणां सुकृतस्य पुण्यकर्मणो विपर्ययो दुष्कृतं तस्मात्पापादित्यर्थः । कुतोऽपि कस्मादपि वचोऽविषयात् तादृक् तादृशी विचित्रा मतिर्बुद्धिरवतरति संजायते यया दुर्बुद्ध्या नृपश्री राजलक्ष्मीः पयोधेः समुद्रस्य तटे तीरे गिरिः पर्वतस्तेन संघटिता संघट्टमासादिता नौरिव नौकेव झटिति द्राग् विघटते विपन्ना भवति समुद्रे मज्जति इति भावः । उपमालङ्कारः ।