विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९३ ) भाषा शस्त्रो की मार से बेहोश हाथी सवार, अपने हाथी के कानो की हवा से होश में आकर अपने को मारने वाले को दूसरे ने मारकर गिराया हुआ देख कर बदला न ले सकने के कारण पश्चात्ताप करने लगा । नयनगतमरातिवीरचूडा-मणिवलनप्रभवं परागमेकः । करिदर्शनविदारितात्मवक्षः-स्थलरुधिराञ्जलिभिनिराचकार ॥७५॥ अन्वयः एकः नयनगतम् अरातिवीरचूडामणिदलनप्रभवं परागं करिदर्शन- विदारितात्मवक्षःस्थलरुधिराञ्जलिभिः निराचकार । व्याख्या एक कश्चिद्भटो नयनयोर्नेत्रयोर्गतं प्राप्तमरातय शत्रवो वीराश्शूरा इत्यरा- तिवीरास्तेषां चूडामणयोऽलङ्कारभूता शिरोमणयस्तेषां दलनं चूर्णनमेव प्रभव उत्पत्तिस्थानं यस्य स तं परागं धूलिं करिणा हस्तिना दशनैर्दन्तैर्विदारितं भिन्न- मात्मनस्स्वस्य वक्ष स्थलं तस्य रुधिरस्य शोणितस्याऽञ्जलयस्तैर्निराचकार दूरीकृतवान् । येन वीरेण कस्यचिद्भटस्य चूडामणि खण्डितस्तस्य केनाऽपि करिणा वक्ष स्थलं विदारितमिति तुमुलं युद्ध समजनीति भाव । अतिश- योक्त्यलङ्कारः । भाषा किसी योद्धा न अपने आंख में पडी, विपक्षी वीरा के शिरोमणियो को चूर २ कर देने से उत्पन्न धूलि को हाथी के दातो स चीरी हुई अपनी छाती से निकलने वाले खूनो की अञ्जुलियो स धो डाला । अर्थात् आंख में पडी धूल को पानी न होने से खून स ही धोकर सफा कर दिया तात्पर्य यह कि घोर सग्राम होने लगा । महति समरसङ्कटे भटोऽन्यः प्रतिभटनिर्दलनात्समाप्तशस्त्रः । व्यगणितमरणः प्रविश्य वेगादरिकरात् करवालमाचकर्ष ॥७६॥ अन्वयः महति समरसङ्कटे प्रतिभटनिर्दलनात् समाप्तशस्त्रः अन्यः भटः व्यगणितमरणः (सन्) वेगात् प्रविश्य अरिकरात् करवालम् आचकर्ष ।