भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

( ४४५ ) व्यसनत्वं, तत्र कामिनीस्पर्शजनितसुखानुभवश्चेति भावः। 'पादाघातादशोकं विकसति बकुलं योषितामास्यमधैः' इति कविसमयः। भाषा मोलसरी के वृक्ष की, (फूलने के लिये) कामिनी के शराब के कुल्ले की अभिलाषा को जानने वाला अशोक वृक्ष, (अपने फूलने के लिये) कामिनी के पाद प्रहार की अभिलाषा रखने वाले अपने को अपेक्षाकृत कम व्यसनी समझने लगा। अर्थात् अपने ऊपर झूठी शराब के थूके जाने से कामिनी की लात खा लेना अच्छा है ऐसा समझने लगा। क्योकि उसमें कामिनीस्पर्शजनित सुखानुभूति होती है। चूतद्रुमालीभुजपञ्जरेण रणद्विरेफावलिकङ्कणेन। मित्रं मधुः कोकिलमञ्जुनाद-पूर्वाभिभाषी स्मरमालिलिङ्ग ॥४६॥ अन्वयः मित्रं कोकिलमञ्जुनादपूर्वाभिभाषी मधुः रणद्विरेफावलिकङ्कणेन चूतद्रुमालीभुजपञ्जरेण स्मरम् आलिलिङ्ग। व्याख्या मित्रं सुहृत् 'अथ मित्रं सखा सुहृत्' इत्यमरः। कोकिलानां पिकानां मञ्जुनादः प्रियध्वनिः पूर्वो यस्मिन्कर्मणि तत् कोकिलमञ्जुनावपूर्वं यथास्यात्तथा- भिभाषते स्वागतं वदतीति अथवा कोकिलनादेन पूर्वाभिभाषी प्रथमस्वागतकर्ता मधुर्वसन्तो रणन्तो झङ्कारशब्द कुर्वन्तो द्विरेफाः भ्रमरास्तेषामावलिः पद्धतिः 'वीथ्यालिरावलिः पक्तिः श्रेणी लेखास्तु राजयः' इत्यमरः। एव कङ्कणं यस्य स तेन भ्रमरपङ्क्तिरूपकङ्कणयुक्तेन चूतद्रुमाणां सहकारवृक्षाणामावलिः पंक्तिरेव भुजपञ्जरं बाहुपिञ्जरं बाहुपाश इत्यर्थः। तेन सहकारवृक्षावलिरूपबाहुपाशेन स्मरं काममालिलिङ्ग परिरब्धवान्। मधौ मित्रत्वारोपश्चूतद्रुमाल्यां भुजपञ्ज- राद्यारोपो रणद्विरेफावल्यां कङ्कणत्वारोपश्च स्मरकर्मकालिङ्गने हेतुरिति रूपकम्। भाषा मित्र तथा कोयल की कोमल कूक से प्रथम स्वागत करने वाले वसन्त ऋतु ने गुंजार करने वाले भौरों की कतार रूपी कंगन वाले आम के पेड़ों की कतार रूपी बाहुपाश में कामदेव का आलिङ्गन किया।