भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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( ३७ ) भाषा ब्रह्माने, इन्द्र द्वारा इस प्रकार कहे हुए वचनों को सुन कर, सन्ध्या सम्बन्धि जल से भरी अँजुली पर अपने ध्यानयुक्त नेत्रों को डाला अर्थात् उसे ध्यान पूर्वक देखा । १कुलकारम्भः— प्रकोष्ठपृष्ठस्फुरदिन्द्रनील-रत्नावलीकङ्कणडम्बरेण । बन्धाय धर्मप्रतिबन्धकानां वहन्सहोत्थानिव नागपाशान् ॥४७॥ अन्वयः प्रकोष्ठपृष्ठस्फुरदिन्द्रनीलरत्नावलीकङ्कणडम्बरेण धर्मप्रतिबन्धकानां बन्धाय सहोत्थान् नागपाशान् वहन् इव । (सुभटो विधातुश्चुलुकादा- विरासीदिति पञ्चपञ्चाशत्संख्याकश्लोकेन सम्बन्धः ।) व्याख्या प्रकोष्ठस्य कूर्पराधोभागस्य पृष्ठे पृष्ठभागे स्फुरन्ती देदीप्यमाना येन्द्रनील- रत्नानामिन्द्रनीलमणीनां रत्नविशेषाणामावली पङ्क्तिस्तस्याः कङ्कणङ्करभूषणं 'कंकणं करभूषणम्' इत्यमरः । तस्य डम्बरेण मिषेण प्रकोष्ठस्थितेन्द्रनीलमणि- घटित-करभूषण-मिषेण धर्मप्रतिबन्धकानां धर्मप्रतिरोधकानामधार्मिकाणामित्यर्थः । बन्धाय नियन्त्रणाय जन्मना सहोत्तिष्ठन्तीति प्रादुर्भवन्तीति सहोत्थांस्तान्, राज्ञो जन्मकालादेव समुत्पन्नान् नागपाशान् सर्परज्जूंवहन्निव धारयन्निव—सुभटो धातु- श्चुलुकादाविरासीदिति सम्बन्धः । इन्द्रनीलरत्नावलीकङ्कणे नागपाशस्य संभावनातदुत्प्रेक्षा । सा च 'डम्बरेण' इत्यपह्नुतिमूलत्वात्सापह्नुवा । भाषा कलाई पर बधे हुए इन्द्रनीलमणि के कंगन के मिष से, धर्म द्रोहियों को बाधने के लिए मानो साथ ही में उत्पन्न भये हुए नागफाश को धारण करता हुआ (एक वीर ब्रह्मा जी की अजुली से उत्पन्न हुआ ।) (इसका सम्बन्ध ५५ वें श्लोक से है ।) १ कुलकलक्षणं त्रिचत्वारिंशत्तमश्लोकटिप्पण्यां द्रष्टव्यम् ।

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