विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७ ) जाने के कारण फिर अपने को विभूषित करने का अवसर न आने से उनके केशपाश पति की जीवितावस्था के संस्कारों से रहित थे और पत्रावलि रूप मण्डन भी फिर से न ठीक किये जाने से खण्डित हो गया था । उत्खातविश्वोत्कटकण्टकानां यत्रोदितानां पृथिवीपतीनाम् । क्रीडागृहप्राङ्गणलीलयैव बभ्राम कीर्त्तिर्भुवनत्रयेऽपि ॥६०॥ अन्वयः यत्र उदितानाम् उत्खातविश्वोत्कटकण्टकानां पृथिवीपतीनां कीर्त्तिः क्रीडागृहप्राङ्गणलीलया एव भुवनत्रये अपि बभ्राम । व्याख्या यत्र चालुक्यवंशे उदितानां समुत्पन्नानामुत्खातानि समूलमुच्छेदितानि विश्वस्य संसारस्योत्कटाः प्रकाण्डाः कण्टका विघ्नभूता दुष्टा राजान (क्षुद्रशत्रवः) यैस्तेषां पृथिवीपतीनां महीपतीनां कीर्त्तिर्यशः क्रीडागृहस्य लीलागृहस्य यत्प्राङ्गण- माभ्यन्तरभूमिस्तस्मिन् या लीलाऽधिकपरिश्रमं विना सञ्चरणादिविलासस्तयैवाऽना- यासेनैव भुवनत्रयेऽपि लोकत्रयेऽपि बभ्राम सञ्चचाल । भाषा संसार के अत्यन्त भयङ्कर उपद्रव रूपी क्षुद्र राजाओं को समूल नष्ट करने वाले, चालुक्य वंश में उत्पन्न राजाओं की कीर्ति, क्रीडागृह के अँगने में रहने के समान ही तीनों लोकों में अनायास से ही फैल गई । अर्थात् विरोधी राजाओं का नाश कर देने पर तीनों लोकों में निष्कण्टक राज्य हो जाने से विरोधियों के अभाव में सर्वत्र अनायास ही कीर्ति फैल गई । क्योंकि तीनों लोक उनके लिये निर्भय घर के अँगने के समान हो गया था । यत्पार्थिवैः शत्रुकठोरकण्ठ-पीठास्थिनिर्लोठन-कुण्ठधारः । निन्ये कृपाणः पटुतां तदीय-कपालशाणोपलपट्टिकासु ॥६१॥ अन्वयः यत्पार्थिवैः शत्रुकठोरकण्ठपीठास्थिनिर्लोठनकुण्ठधारः कृपाणः तदीय- कपालशाणोपलपट्टिकासु पटुतां निन्ये ।