विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 493 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५३ ) भाषा क्रम से उस वंश का तिलकरूप प्रतापी श्री तैलप नाम का राजा हुआ, जिसने युद्ध में देखते २ शत्रुओं के वीररस रूपी जल को अपने प्रताप की गर्मी से सुखा कर खून के कीचड के रूप में परिणत कर दिया। अर्थात् शत्रुओं की वीरता नष्ट करते हुए युद्धभूमि को खून से भर दिया। विश्वम्भराकण्टकराष्ट्रकूट-समूलनिर्मूलनकोविदस्य । सुखेन यस्यान्तिकमाजगाम चालुक्यचन्द्रस्य नरेन्द्रलक्ष्मीः ॥६६॥ अन्वयः नरेन्द्रलक्ष्मीः विश्वम्भराकण्टकराष्ट्रकूटसमूलनिर्मूलनकोविदस्य चालु- क्यचन्द्रस्य यस्य अन्तिकं सुखेन आजगाम । व्याख्या नरेन्द्राणां प्रतिपक्षभूपानां लक्ष्मी राज्यश्रीर्विश्वम्भराया भूमे कण्टकभूतः कष्टदायको यो राष्ट्रकूटस्तन्नाम-राजवंशस्तस्य समूलं यथास्यात्तथा निर्मूलने विनाशाकरणे कोविदो निपुणस्तस्य चालुक्यचन्द्रस्य चालुक्यवंशे चन्द्रोपमस्य यस्य श्रीतैलपस्यान्तिकं समीप सुखेन प्रेम्णाऽऽजगाम प्राप्ता। राष्ट्रकूटराजवंशे नष्टे सति तस्य राज्यश्रीरेनं वृतवती। भाषा पृथ्वी पर कण्टक रूप राठौर वंश के राजाओं को समूलनष्ट करने में प्रवीण, चालुक्य वंश के चन्द्ररूप उस तैलप राजा के पास विपक्षी राजाओं की राज्यश्री सुख से आ गई। शौर्योष्मणा स्विन्नकरस्य यस्य संख्येपु खङ्गः प्रतिपक्षकालः । पुरन्दरप्रेरितपुष्पवृष्टि-परागसङ्गान्नियिडत्वमाप ॥७०॥ अन्वयः संख्येपु शौर्योष्मणा स्विन्नकरस्य यस्य प्रतिपक्षकालः खङ्गः पुरन्दर प्रेरितपुष्पवृष्टिपरागसङ्गात् निविडत्वम् आप ।