भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 147

१३६ विनय-पत्रिका सत सारदा सेष श्रुति मिलिकै, सोभा कहि न सिराई। तुलसिदास मतिमंद द्वंद्वरत कहै कौन विधि गाई ॥१३॥ शब्दार्थ—अधाई = अघाकर, तृप्त होकर। बिसद = निर्मल। पीन = पुष्ट। पदज = पैरकी अँगुलियाँ। जातरूप = सुवर्ण। हेम = सुवर्ण। कल = सुन्दर। कलित = कली। गजमनि- माल = गजमुक्ताकी माला। पदक = रत्न। उडुगन = तारागण। अथाई = सभा। भुजगभोग = सर्पका शरीर। कुलिस = हीरा। कुडमल = कली। भाई = प्यारी लगती है, भाती है। कुंचित = घुँघराले। अलप = अल्प। दुकूल = वस्त्र। इंदिरा = लक्ष्मी। हेमलता = सुवर्ण-लता। निचोल = वस्त्र। भावार्थ—इस शरीरका सबसे बड़ा फल और सबसे बढ़कर बड़प्पन यही है कि ये नेत्र तृप्त होकर भगवान् विन्दुमाधवकी नखसे शिखतक मनोहर छविको देखें ॥१॥ वह निर्मल, किशोर, पुष्ट और सुन्दर शरीरवाले हैं, श्यामलतासे उनकी सुन्दरता और भी बढ़ गयी है। जान पड़ता है कि नीले कमल, मेघ, तमाल और (नीलम) मणिने इन्हींके शरीरसे कान्ति पायी है ॥२॥ इनके कोमल चरणोंमें शुभ चिह्न हैं, अँगुलियों और नखोंकी ऐसी अभूतपूर्व उपमा है मानो लाल और नीले कमलोंसे रत्न-संयुक्त पत्तोंका समूह उत्पन्न हुआ हो (अर्थात् ऊपर श्याम और नीचे लाल; क्योंकि भगवान्‌के चरणोंका ऊपरी भाग श्यामल है और तलवा लाल। यहाँ कमलदल सदृश अँगुलियाँ हुईं और उस दलके ऊपर जटित मणिके समान नख हैं। किन्तु न तो दो रंगका कमल होता है और न उसके पत्ते मणि-जटित ही होते हैं; बस यही 'अति अभूत उपमा' है ॥३॥ रत्नोंसे जड़े हुए मनोहर सुवर्णके नूपुर भक्तोंको आनन्द देनेवाले हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो शिवजीके हृदयमें विष्णु भगवान् अनेक रूप धारण करके श्रेष्ठ मन्दिर बनाकर निवास कर रहे हों ॥४॥ कमरमें सुन्दर करधनी जो रट लगाये रहती है, उसका शब्द ही अनुपम और वर्णनातीत है। ऐसा भान होता है मानो सुवर्णकी कलियोंके बीच भौरोंका गुंजार हो रहा हो ॥५॥ विशाल वक्षः- स्थलपर जो भृगु ऋषिका अत्यन्त सुन्दर चरण-चिह्न अंकित है, वह वक्षःस्थलकी कोमलता सूचित कर रहा है। कंकण आदि अनेक तरहके सुन्दर आभूषणोंको मानो ब्रह्माने दिल लगाकर अपने हाथसे बनाया है ॥६॥ गजमुक्ताकी मालाके बीचमें नौंकी जो चौकी विराज रही है, उसकी अच्छाई नहीं कही जा सकती;