विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १३५ राग-असावरी ( ६२ ) इहै परम फलु, परम बड़ाई । नख-सिख रुचिर बिन्दुमाधव छवि निरखहिं नयन अघाई ॥१॥ विसद किसोर पीन सुंदर वपु, स्याम सुरुचि अधिकाई ॥ नील कंज, वारिद, तमाल, मनि, इन्ह तनुते दुति पाई ॥२॥ मृदुल चरन सुभ चिन्ह, पदज, नख, अति अभूत उपमाई । अरुन नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई ॥३॥ जातरूप मनि-जटित मनोहर, नूपुर जन-सुखदाई । जनु हर-उर हरि विविध रूप धरि, रहे घर भवन बनाई ॥४॥ कटितट रटति चारु किंकिन-रव, अनुपम, बरनि न जाई । हेम जलज कल कलित मध्य जनु, मधुकर मुखर सुहाई ॥५॥ उर विसाल भृगुचरन चारु अति, सूचत कोमलताई । कंकन चारु विवध भूषन विधि, रचि निज कर मन लाई ॥६॥ गज-मनिमाल वीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई । जनु उडुगन-मंडल वारिदपर, नवग्रह रची अयाई ॥७॥ भुजंगभोग-भुजदंड कंज, दर, चक्र, गदा वनि आई । सोभासीव ग्रीव, चिबुकाधर, वदन अमित छवि छाई ॥८॥ कुलिस, कुंद-कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई । नासा-नयन-कपोल, ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहिं भाई ॥९॥ कुंचित कच सिर मुकुट, भालपर, तिलक कहाँ समुझाई । अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई ॥१०॥ निरमल पीत दुकूल अनूपम, उपमा हिय न समाई । बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर, कनक-बसन रुचिराई ॥१०॥ दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई । हेमलता जनु तरु तमाल ढिग, नील निचोल ओढ़ाई ॥१२॥