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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका १३५ राग-असावरी ( ६२ ) इहै परम फलु, परम बड़ाई । नख-सिख रुचिर बिन्दुमाधव छवि निरखहिं नयन अघाई ॥१॥ विसद किसोर पीन सुंदर वपु, स्याम सुरुचि अधिकाई ॥ नील कंज, वारिद, तमाल, मनि, इन्ह तनुते दुति पाई ॥२॥ मृदुल चरन सुभ चिन्ह, पदज, नख, अति अभूत उपमाई । अरुन नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई ॥३॥ जातरूप मनि-जटित मनोहर, नूपुर जन-सुखदाई । जनु हर-उर हरि विविध रूप धरि, रहे घर भवन बनाई ॥४॥ कटितट रटति चारु किंकिन-रव, अनुपम, बरनि न जाई । हेम जलज कल कलित मध्य जनु, मधुकर मुखर सुहाई ॥५॥ उर विसाल भृगुचरन चारु अति, सूचत कोमलताई । कंकन चारु विवध भूषन विधि, रचि निज कर मन लाई ॥६॥ गज-मनिमाल वीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई । जनु उडुगन-मंडल वारिदपर, नवग्रह रची अयाई ॥७॥ भुजंगभोग-भुजदंड कंज, दर, चक्र, गदा वनि आई । सोभासीव ग्रीव, चिबुकाधर, वदन अमित छवि छाई ॥८॥ कुलिस, कुंद-कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई । नासा-नयन-कपोल, ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहिं भाई ॥९॥ कुंचित कच सिर मुकुट, भालपर, तिलक कहाँ समुझाई । अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई ॥१०॥ निरमल पीत दुकूल अनूपम, उपमा हिय न समाई । बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर, कनक-बसन रुचिराई ॥१०॥ दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई । हेमलता जनु तरु तमाल ढिग, नील निचोल ओढ़ाई ॥१२॥

१३६ विनय-पत्रिका सत सारदा सेष श्रुति मिलिकै, सोभा कहि न सिराई। तुलसिदास मतिमंद द्वंद्वरत कहै कौन विधि गाई ॥१३॥ शब्दार्थ—अधाई = अघाकर, तृप्त होकर। बिसद = निर्मल। पीन = पुष्ट। पदज = पैरकी अँगुलियाँ। जातरूप = सुवर्ण। हेम = सुवर्ण। कल = सुन्दर। कलित = कली। गजमनि- माल = गजमुक्ताकी माला। पदक = रत्न। उडुगन = तारागण। अथाई = सभा। भुजगभोग = सर्पका शरीर। कुलिस = हीरा। कुडमल = कली। भाई = प्यारी लगती है, भाती है। कुंचित = घुँघराले। अलप = अल्प। दुकूल = वस्त्र। इंदिरा = लक्ष्मी। हेमलता = सुवर्ण-लता। निचोल = वस्त्र। भावार्थ—इस शरीरका सबसे बड़ा फल और सबसे बढ़कर बड़प्पन यही है कि ये नेत्र तृप्त होकर भगवान् विन्दुमाधवकी नखसे शिखतक मनोहर छविको देखें ॥१॥ वह निर्मल, किशोर, पुष्ट और सुन्दर शरीरवाले हैं, श्यामलतासे उनकी सुन्दरता और भी बढ़ गयी है। जान पड़ता है कि नीले कमल, मेघ, तमाल और (नीलम) मणिने इन्हींके शरीरसे कान्ति पायी है ॥२॥ इनके कोमल चरणोंमें शुभ चिह्न हैं, अँगुलियों और नखोंकी ऐसी अभूतपूर्व उपमा है मानो लाल और नीले कमलोंसे रत्न-संयुक्त पत्तोंका समूह उत्पन्न हुआ हो (अर्थात् ऊपर श्याम और नीचे लाल; क्योंकि भगवान्‌के चरणोंका ऊपरी भाग श्यामल है और तलवा लाल। यहाँ कमलदल सदृश अँगुलियाँ हुईं और उस दलके ऊपर जटित मणिके समान नख हैं। किन्तु न तो दो रंगका कमल होता है और न उसके पत्ते मणि-जटित ही होते हैं; बस यही 'अति अभूत उपमा' है ॥३॥ रत्नोंसे जड़े हुए मनोहर सुवर्णके नूपुर भक्तोंको आनन्द देनेवाले हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो शिवजीके हृदयमें विष्णु भगवान् अनेक रूप धारण करके श्रेष्ठ मन्दिर बनाकर निवास कर रहे हों ॥४॥ कमरमें सुन्दर करधनी जो रट लगाये रहती है, उसका शब्द ही अनुपम और वर्णनातीत है। ऐसा भान होता है मानो सुवर्णकी कलियोंके बीच भौरोंका गुंजार हो रहा हो ॥५॥ विशाल वक्षः- स्थलपर जो भृगु ऋषिका अत्यन्त सुन्दर चरण-चिह्न अंकित है, वह वक्षःस्थलकी कोमलता सूचित कर रहा है। कंकण आदि अनेक तरहके सुन्दर आभूषणोंको मानो ब्रह्माने दिल लगाकर अपने हाथसे बनाया है ॥६॥ गजमुक्ताकी मालाके बीचमें नौंकी जो चौकी विराज रही है, उसकी अच्छाई नहीं कही जा सकती;

मानो मेघपर तारागणकी मंडलीके बीचमें नवग्रहोंकी सभा बैठी हो। (यहाँ नीले मेघके समान भगवान्‌का शरीर है, तारा-मंडल गजमुक्ताकी माला है और उसके बीचमें पिरोये हुए रंग-बिरंगे रत्न नवग्रह हैं) ॥७॥ सर्पके शरीर जैसे भुजदंडोंमें कमल, शंख, चक्र और गदा शोभित हो रहे हैं। ग्रीवाकी सुन्दरतामें सौन्दर्यकी हद है। चिबुक, अधर तथा मुखपर अमित छवि छायी हुई है ॥८॥ दाँतोंको देखकर हीरे, कुन्दकी कलियों और बिजलीकी चमकको लज्जित होना पड़ता है। नासिका, नेत्र, कपोल, ललित कर्ण-कुंडल तथा भौंहें मुझे बहुत भाती हैं ॥९॥ सिरपर घुँघराले बालोंके ऊपर मुकुट है; माथेपर जो तिलक है उसे समझकर कहता हूँ, मानो बिजलीकी दो छोटी रेखाएँ चन्द्र-मंडल (मुख) में अपनी चंचलता छोड़कर बस रही हों ॥१०॥ स्वच्छ और उपमा-रहित पीताम्बरकी उपमा हृदयमें समाती ही नहीं, (तथापि यथाशक्ति कल्पना की जाती है) मानो बहुत-से मणियोंसे संयुक्त नीले पर्वत-शिखरपर सुनहला वस्त्र सुशोभित हो रहा हो ॥११॥ दाहिनी ओर प्रेम-सहित बैठी हुई लक्ष्मीजीसे शोभा और भी बढ़ गयी है। ऐसा जान पड़ता है मानो तमाल वृक्षके पास नीला वस्त्र ओढ़े स्वर्ण- लता बैठी हो ॥ सैकड़ों सरस्वती, शेष और वेद मिलकर इस शोभाका वर्णन करके समाप्त नहीं कर सकते, फिर भला द्वन्द्वरत तथा मूढ़बुद्धि तुलसीदास इस दिव्य शोभाका वर्णन किस प्रकार कर सकता है ॥१२॥

विशेष १—‘किसोर’—छःअवस्थाओंके अन्तर्गत एक अवस्था। वे छ अवस्थाएँ हैं:—१ शिशु, २ कौमार, ३ पौगंड, ४ किशोर, ५ यौवन, ६ जरा। ग्यारहसे पन्द्रह वर्षके भीतरकी अवस्थाको किशोरावस्था कहते हैं। पर यहाँ किशोरसे पन्द्रह वर्षकी अवस्था ही समझनी चाहिये। २—‘नीलकंज······दुति पाई’—में प्रतीप अलंकार है। प्रतीपका अर्थ है उलटा (प्रतिलोम्यात् प्रतीपं)। प्रतीपालंकारका यह लक्षण है:— प्रसिद्धस्योपमानस्योपमेयत्वप्रकल्पनम्। निष्फलत्वाभिधानं वा प्रतीपमिति कथ्यते ।—साहित्यदर्पणे । अर्थात् प्रसिद्ध उपमानको उपमेय बनाना या उसको निष्फल बतलाना

१३८ विनय-पत्रिका प्रतीप अलंकार है। इसके पाँच भेद हैं। उनमें प्रथम प्रतीपका लक्षण काव्य- प्रभाकरमें इस प्रकार है:— सो प्रतीप उपमेय सम, जब कहिय उपमान। लोचनसे अम्बुज बने, मुखसों चन्द बखान ॥ अर्थात् जहाँ उपमानमें उपमेयकी कल्पना की जाय। जैसे 'नेत्रोंके समान कमल बने हैं और मुखके समान चन्द्रमा।' यहाँ नेत्र और मुख जो उपमेय हैं, वे उपमान हो गये हैं। प्रतीपके प्रथम भेदका एक उदाहरण और लीजिये :— “उतरि नहाये जमुन जल, जो सरीर-सम स्याम।” —रामचरितमानस । यहाँपर उक्त अलंकार ही है। ३—'अभूत उपमाई'—'अभूत उपमा' का लक्षण महाकवि केशवदासने इस प्रकार लिखा है:— उपमा जाय कही नहीं, जाको रूप निहारि। अस अभूत उपमा कही, केसवदास विचारि ॥ —कवि-प्रिया। वियोगि हरिजीने यहाँपर 'अद्भुत उपमाई' पाठ मानकर 'कुछ विचित्र ही उपमा' अर्थ किया है, पाठक ही विचार करें कि इन दोनोंमें कौन-सा पाठ और अर्थ ठीक है। ४—आगे 'अरुननील' आदि पंक्तियोंमें उत्प्रेक्षालंकार है। ५—'जनु हर-उर हरि' के स्थानपर कहीं-कहीं 'जनु हर-डर-हरि पाठ भी है। जहाँ ऐसा पाठ है वहाँ 'हरि' का अर्थ कामदेव होगा। मानो हरके डरसे कामदेवने नानारूप धारण करके श्रेष्ठ घर बना रखा है। अर्थात् कामदेवने अपनेको शिवजीका अपराधी समझकर यह स्थिर किया कि भगवान्के चरणोंकी शरणमें गये बिना और कहीं रक्षा नहीं हो सकती। इसीसे वह भगवान्के चरणोंके नूपुररूपी घरमें स्वरस्वरूप होकर घुस पड़ा है। ६—'उर बिसाल भृगुचरन'—एक बार भृगु ऋषिने क्रुद्ध होकर भगवान्के हृदयपर पदाघात किया था। अतः उनके पैरका चिह्न भगवान्के वक्षःस्थलपर अंकित हो गया।

विनय-पत्रिका १३९ ७—'नवग्रह'—सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र शनि, राहु और केतु ये नवग्रह हैं। प्रत्येक ग्रहका रंग भिन्न-भिन्न है; जैसे सूर्य और मंगलका रंग लाल, बृहस्पतिका पीला, शनि, राहु और केतुका काला, बुधका हरा तथा चन्द्रमा और शुक्रका श्वेत है। उसी प्रकार रत्न भी विभिन्न रंगके हैं। वियोगी हरिजीने अपनी टिप्पणीमें सूर्यका रंग श्वेत लिखा है। ऐसा उल्लेख उन्हें कहाँ मिला, कहा नहीं जा सकता। राग जयतिश्री ( ६३ ) मन इतनोई या तनुको परम फलु । 'सब अँग सुभग बिन्दुमाधव छबि, तजि सुभाव, अवलोकु एक फला॥१॥ तरुन अरुन अंबोज चरन मृदु, नख-द्युति हृदय-तिमिर-हारी । कुलिस-केतु-जव-जलज रेख वर, अंकुस मन-गज-बसकारी ॥२॥ कनक-जटित मनि नूपुर, मेखल, कटि-तट रटति मधुर बानी । त्रिवली उदर, गँभीर नाभि सर, जँह उपजे विरंचि ग्यानी ॥३॥ उर वनमाल, पदक अति सोभित, विप्र-चरन चित कहँ करषै । स्याम तामरस-दाम-वरन वपु, पीत बसन सोभा बरषै ॥४॥ कर कंकन केयूर मनोहर, देति मोद मुद्रिक न्यारी । गदा, कंज, दर, चारु चक्रधर, नाग-सुंड-सम भुज चारी ॥५॥ कंबु ग्रीव, छबिसीव चिवुक द्विज, अधर अरुन, उन्नत नासा । नव राजीव नयन ससि आनन, सेवक-सुखद बिसद हासा ॥६॥ रुचिर कपोल, श्रवन कुंडल, सिर मुकुट, सुतिलक भाल भ्राजै । ललित भृकुटि, सुंदर चितवनि, कच निरखि मधुप-अवली लाजै ॥७॥ रूप-सील-गुनखानि दच्छ दिसि, सिंधु सुता रत-पद सेवा । जाकी कृपा-कटाच्छ चहत सिव, बिधि, मुनि, मनुज, दनुज, देवा ॥८॥ १. 'सब अँग सुभग'के स्थानपर 'नख-सिख रुचिर' पाठ भी मिलता है।

१४० विनय-पत्रिका

तुलसिदास भव-त्रास मिटै तब, जब मति येहि सरूप अटकै। नाहिंत दीन मलीन हीन-सुख, कोटि जनम भ्रमि भ्रमि भटकै ॥९॥ शब्दार्थ-केतु = पताका । त्रिवली = पेटकी रेखाएँ या तीन पेटी । विप्र = ब्राह्मण; यहाँ भृगु ऋषिके लिए आया है । करषै = आकर्षित करता है । दाम = गुच्छा, माला । मुद्रिक = अँगूठी । सिंधुसुता = समुद्र-कन्या, लक्ष्मीजी । अटकै = फँस जाता है । भावार्थ-हे मन, इस शरीरका परम फल इतना ही है कि अपना स्वभाव छोड़कर सुन्दर अंग-प्रत्यंगवाले भगवान् विन्दुमाधवजीकी छविका एक पलके लिए अवलोकन कर ॥१॥ उनके कोमल चरण पूर्ण विकसित लाल कमलके समान हैं और नखोंकी प्रभा हृदयके अन्धकारको दूर करनेवाली है। उनके चरणोंमें वज्र, पताका, जौ, कमल आदिकी श्रेष्ठ रेखाएँ हैं और अंकुशका चिह्न मनरूपी हाथीको वशमें करनेवाला है ॥२॥ पैरोंमें मणि-जटित स्वर्ण-नूपुर और कटिभागमें करधनी मधुर स्वरमें बज रही है। पेटपर तीन पेटियाँ (लकीरें) पड़ी हैं और गम्भीर नाभि मानो सरोवर है जहाँसे ज्ञानी ब्रह्मा प्रकट हुए हैं ॥३॥ हृदयपर वनमाला और उसके बीचमें रत्नोंकी चौकी अत्यन्त शोभायमान हो रही है; वहाँपर जो भृगु-चरणका चिह्न है, वह चित्तको खींच लेता है। नीले कमलके गुच्छेके रंगका शरीर है; उसपर पीताम्बर तो मानो शोभाकी वर्षा कर रहा है ॥४॥ हाथोंमें मनोहर कंकण और विजयठ हैं; अँगूठी अलग ही आनन्द दे रही है। हाथीकी सूँड़के समान चारों भुजाओंमें गदा, पद्म, शंख और सुन्दर सुदर्शन चक्र धारण किये हैं ॥५॥ शंखके समान ग्रीवा है, चिबुक और दाँतोंमें सुन्दरताकी हद हो गयी है; लाल ओठ और उन्नत (सुडौल) नासिका है। नवीन कमलके समान नेत्र, चन्द्रमाके समान मुख और स्वच्छ हँसी भक्तोंको सुख देनेवाली है ॥६॥ सुन्दर कपोल हैं, कानोंमें कुण्डल हैं, सिरपर मुकुट है और ललाटपर सुहावना तिलक शोभित हो रहा है। ललित भौंहें और सुन्दर चितवन है; काले बालोंको देखकर भ्रमरोंकी पंक्ति लज्जित हो जाती है ॥७॥ रूप, शील और गुणोंकी खानि लक्ष्मीजी उन भगवान् विन्दुमाधवकी दाहिनी ओर बैठी उनके चरणोंकी सेवामें तल्लीन हैं-जिनकी कृपा-दृष्टि शिव, ब्रह्मा, मुनि, मनुष्य, दैत्य और देवता भी चाहते हैं ॥८॥ तुलसीदास कहते हैं कि यह संसार-भय तभी मिटता है, जब बुद्धि इस स्वरूपमें अटक जाती है; नहीं तो (प्रत्येक

विनय-पत्रिका १४१ मनुष्यको) दीन, मलीन और सुख-रहित होकर करोड़ों जन्मतक भरम-भरमकर भटकना पड़ता है, मरना और जन्म लेना लगा रहता है ॥९॥ विशेष १—'तजि सुभाव'—मनका स्वभाव स्वाभाविक ही चंचल है। नैय्या- यिकोंने मनके गुणके सम्बन्धमें 'अपरत्वं, परत्वं, संख्या, वेगश्च' इत्यादि लिखा है। गीतामें अर्जुनने भगवानसे कहा है:— 'चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥' मन इतना अधिक चंचल है, इसीसे गोस्वामीजीने केवल पलभर देखनेके लिए कहा है। क्योंकि यह चपल मन पहले पलभर तो स्थिर रहकर प्रभुकी ओर देख ले, अधिक देरतक देखना तो बहुत दूरकी बात है। २—'नख दुति'—श्रीमद्भागवतमें भगवान्के पदारविन्दके वर्णनमें नख- द्युतिकी अनूठी झलक दिखाई पड़ती है। ३—'त्रिवली' पर किसी कविने कहा है— कैधौं मैनभूपतिके रथके सुचक्र चले दिन ही की लीकँ उर भूपै जान तौन है। कैधौं मैन ठगकी गली ये भली ठगिबेकी कैधौं रूपनदी ह्वै तिधार कियो गौन है॥ ऐसी छवि देखी एरी मोहे मनमोहन जू यातें मैंहू जानी येही मोहबेको भौन है। एक बली सबहीको बस करि राखत है त्रिबली जो करै बस अचरज कौन है ॥ राग-बसन्त ( ६४ ) बंदौं रघुपति करुना-निधान। जाते छूटै भव-भेद-ग्यान ॥१॥ रघुवंस-कुमुद-सुखप्रद निसेस। सेवत पद-पंकज अज-महेस ॥२॥ निज भक्त-हृदय-पाथोज-भृंग। लावन्य बपुष अगनित अनंग॥३॥ अति प्रवल मोह-तम-मारतंड। अग्यान-गहन-पावक प्रचंड ॥४॥ अभिमान-सिंधु-कुंभज उदार। सुर-रंजन, भंजन भूमिभार ॥५॥

१४२ विनय-पत्रिका रागादि-सर्पगन-पन्नगारि । कंदर्प नाग मृगपति, सुरारि ॥६॥ भव-जलधि-पोत चरनारविंद । जानकी-रवन आनंद-कंद ॥७॥ हनुमंत-प्रेम-बापी-मराल । निष्काम कामधुक गो दयाल ॥८॥ त्रैलोक-तिलक, गुन-गहन राम । कह तुलसिदास विश्राम धाम॥९॥ शब्दार्थ—निसेस = (निशा + ईश) चन्द्रमा । अनंग = कामदेव । मारतंड = सूर्य । गहन = वन । सुर-रंजन = देवताओंको सुख देनेवाले । कंदर्प = काम । नाग = हाथी । पोत = नौका । बापी = बावली । भावार्थ—मैं करुणा-निधान श्रीरघुनाथजीकी बन्दना करता हूँ, जिससे मेरा सांसारिक भेद-ज्ञान जाता रहे ॥१॥ वह रघुवंश-रूपी कुमुद-पुष्पके लिए सुखप्रद चन्द्रमा हैं; ब्रह्मा और शिव उनके चरणारविन्दकी सेवा किया करते हैं ॥२॥ वह अपने भक्तोंके हृदय-कमलके भ्रमर हैं। उनके शरीरका लावण्य अगणित कामदेवोंके समान है ॥३॥ वह अत्यन्त प्रबल मोहान्धकारको दूर करनेके लिए सूर्यरूप, तथा अविद्यारूपी वनको भस्म करनेके लिए प्रचण्ड अग्नि- रूप हैं ॥४॥ वह अभिमानरूपी समुद्रको सोख जानेके लिए उदार अगस्त्य ऋषि हैं, तथा देवताओंको सुखी करनेके लिए पृथिवीका भार उतारनेवाले हैं ॥५॥ वह राग-द्वेषादि रूपी साँपोंके लिए गरुड, कामदेवरूपी हाथीके लिए सिंह तथा मुर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥६॥ उनके चरणारविन्द संसार-सागरसे पार उतारनेके लिए नौकारूप हैं । वह जानकी-वल्लभ हैं और आनन्दकी वर्षा करनेवाले हैं ॥७॥ वह हनुमान्‌जीकी प्रेम-बावलीके हंस, तथा भक्तोंकी इच्छाएँ पूरी करनेके लिए निष्काम कामधेनुके समान दयालु हैं ॥८॥ तुलसीदास कहते हैं कि वह श्रीरामजी त्रिलोकके शिरोमणि, गुणोंके वन तथा शान्तिके स्थल हैं ॥९॥ विशेष १—'भव भेद ग्यान'—'यह मेरा है, वह तेरा है' 'मैं बड़ा हूँ, वह छोटा है' यही संसारका भेदात्मक ज्ञान है । २—इस पदतक वन्दना करनेके बाद गुसाईंजी अब आगेके पदसे विनय प्रारम्भ करेंगे ।

विनय-पत्रिका १४३ राग-भैरव

राम राम रमु¹, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा । रामनाम नव नेह-मेह को, मन ! हठि होहि पपीहा ॥१॥ सब साधन-फल कूप-सरित-सर, सागर-सलिल निरासा । रामनाम-रति-स्वाति-सुधा-सुभ, सीकर प्रेमपियासा ॥२॥ गरजि, तरजि, पाषान वरषि पवि, प्रीति परखि जिय जानै । अधिक अधिक अनुराग उमँग उर, पर परमिति पहिचानै ॥३॥ रामनाम-गति, रामनाम-मति, रामनाम-अनुरागी । ह्वै गये, हैं, जे होहिंगे त्रिभुवन² तेइ गनियत बड़भागी ॥४॥ एक अंग मग अगमु गवन करि, बिलमु न छिन-छिन छाहैं । तुलसी हित अपनो अपनी दिसि, निरुपाधि नेम निबाहैं ॥५॥

शब्दार्थ-जीहा = जीभ । मेह = बादल । हठि = जबर्दस्ती । बूँद = बूँद । पवि = वज्र । परमिति = पराकाष्ठा । बिलमु = विलम्ब, विभोर होना ।

भावार्थ-हे जीभ ! तू राम राममें रम जा, राम राम रट और राम राम जप । हे मन ! तू रामनाममें प्रेमरूपी नवीन-मेघके लिए जबर्दस्ती पपीहा बन जा ॥१॥ तू अन्य सब साधनोंके फलरूपी कूप, नदी, तालाब और समुद्रके जलकी आशा न रखकर केवल रामनामकी भक्तिरूपी स्वातीकी अमृततुल्य कल्याणकारी बूँदके लिए प्रेमका प्यासा बन जा । अर्थात् जैसे पपीहा, कूप, नदी आदिके जलकी परवाह न करके स्वातीके जलके लिए लालायित रहता है, वैसे ही हे मन, तू भी और सब साधनोंके फलकी आशा छोड़कर रामनाममें लीन होनेके लिए प्रेमकी प्यास लगा ॥२॥ पपीहेका प्रेमी मेघ गरजकर, डाँट बतलाकर तथा पत्थर और वज्र बरसाकर उसके प्रेमको परखता है, उसके बाद वह अपने दिलमें उसे समझकर पहचान लेता है कि पपीहेके हृदयानुरागकी उमंग अत्यन्त अधिक है, चरम सीमाको भी पार कर गयी है ॥३॥ इसी प्रकार तू भी (कष्टोंकी ओर ध्यान

१. पाठान्तर 'रटु' । २. पाठान्तर 'होहिंगे आगे' ।

१४४ विनय-पत्रिका न देकर) रामनाममें ही अपनी गति समझ, राम-नाममें ही बुद्धि लगा और केवल राम-नामका ही प्रेमी बन जा । इस तरहके जितने भक्त हो गये हैं, तथा जो (भविष्यमें) होंगे, वे ही तीनों लोकमें बड़भागी हैं ॥४॥ यह एकांगी मार्ग बड़ा ही कठिन है। इसपर चलकर क्षण-क्षणपर छाया देखकर भूल न जा । ऐ तुलसी- दास ! अपनी ओरसे कपट-रहित नेम निभानेमें ही तेरा निजी हित है ॥५॥ विशेष १—'रटु' 'जपु'—ऊँचे स्वरमें रामनामका उच्चारण करनेके लिए 'रटु' कहा है और धीरे-धीरे कहनेको 'जपु' कहा है । जप केवल अपनेहीको सुनाई पड़ता है, दूसरेको नहीं। जप तीन प्रकारसे होता है, (१) ऊँचे स्वरमें जिसे आस-पासके लोग सुनें, (२) जो केवल अपनेहीको सुनाई पड़े (३) जो अपनेको भी सुनाई न पड़े; इसे मानसिक जप कहते हैं । मानसिक जप सर्वश्रेष्ठ है । २—'छिन छिन छाँहँ'—यहाँ स्त्री, पुत्र, धन-सम्पत्ति, भोग आदि वस्तुएँ ही छायारूप हैं। जो मनुष्य इनके फेरमें पड़कर इन्हींमें अटक जाता है, वह उस स्थानतक नहीं पहुँच सकता । ( ६६ ) राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे । घोर भव-नीर-निधि नाम निज नाव रे ॥१॥ एक ही साधन सब रिद्धि-सिद्धि साधि रे। ग्रसे कलि-रोग जोग-संजम-समाधि रे ॥२॥ भलो जो है, पोच जो है, दाहिनो जो, बाम रे। राम-नाम ही सो अंत सब ही को काम रे ॥३॥ जग नभ-वाटिका रही है फलि फूलि रे। धुवाँ कैसे धौरहर देखि तू न भूलि रे ॥४॥ राम-नाम छाँड़ि जो भरोसो करै और रे। तुलसी भरोसो त्यागि माँगै कूर कौर रे ॥५॥ शब्दार्थ—पोच=नीच। दाहिनो = सम्मुख, सीधा। बाम = विमुख, उलटा। धौरहर = मीनार, धौरहरा, अटारी, महल । और = दूसरेका । कौर = ग्रास ।

विनय-पत्रिका १४५ भावार्थ—ऐ पागल ! राम जप, राम जप, राम जप। इस घोर संसाररूपी समुद्रको पार करनेके लिए रामनाम ही अपनी नौका है ॥१॥ इस एक ही साधनसे तू सब रिद्धि-सिद्धियोंको साध ले; क्योंकि कलिकालरूपी रोगने योग, संयम और समाधिको ग्रस लिया है, अर्थात् इनसे उद्धार नहीं हो सकता ॥२॥ भला हो अथवा बुरा, सम्मुख हो अथवा विमुख, अन्तमें एक राम-नामहीसे सबको काम पड़ेगा ॥३॥ यह संसाररूपी आकाश-वाटिका फूली-फली दिख रही है। (सारांश, यह संसार मिथ्या है; जैसे पुष्पवाटिका में तरह-तरहके फूल-फल दिखाई पड़ते हैं, वैसे ही आकाशमें रंग-बिरंगे बादल दिखाई पड़ते हैं; वास्तवमें यह संसार भ्रमात्मक है और इसके सब सम्बन्ध और सुख भी मिथ्या हैं।) धुएँके महलोंको अर्थात् स्त्री, पुत्र, कलत्रादिको देखकर तू न भूल ॥४॥ जो मनुष्य राम-नामको छोड़कर दूसरेका भरोसा करता है, तुलसीदास कहते हैं कि वह उस मूर्खके समान है जो आगेका परोसा हुआ भोजन छोड़कर (कुत्तेकी तरह) कौरा माँगता फिरता है ॥५॥ विशेष १—'निज नाव रे'—अपनी नौका कहनेका आशय यह है कि राम-नाम- रूपी नौका अपने अधीन है। उसके द्वारा भव-सागर पार होनेमें कोई बाधा नहीं। २—'एक ही......साधि रे'—इसपर गोस्वामीजीने एक जगह क्या ही उत्तम कहा है:— “एकहि साधे सब सधै, सब साधे सब जाइ । तुलसी घर-बन बीच ही, राम-प्रेमपुर छाइ ॥” ३—'जोग'—योगके आठ अंग हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । समाधिके बाद 'निर्विकल्प समाधि' है; उसी समय आत्मसाक्षात्कार होता है। ( ६७ ) राम राम जपु जिय सदा सानुराग रे। कलि न विराग, जोग, जाग, तप, त्याग रे ॥१॥ १०

१४६ विनय-पत्रिका राम सुमिरन सब विधि ही को राज रे । राम को बिसरिबो निषेध-सिरताज रे ॥२॥ राम-नाम महामनि, फनि जग-जाल रे । मनि लिये फनि जियै ब्याकुल बिहाल रे ॥३॥ राम-नाम कामतरु देत फल चारि रे । कहत पुरान, बेद, पंडित, पुरारि रे ॥४॥ राम-नाम प्रेम-परमारथ को सार रे । राम-नाम तुलसी को जीवन-अधार रे ॥५॥ शब्दार्थ-सानुराग = प्रेम-सहित। फनि = साँप। जग-जाल = जगत्-प्रपंच। कामतरु = कल्पवृक्ष। भावार्थ-हे जीव ! प्रेमके साथ राम राम जपा कर। कलियुगमें न तो वैराग्य ही है, और न योग, यज्ञ, तप एवं त्याग ही (अर्थात् ये सफल नहीं हो सकते) ॥१॥ राम-नामका स्मरण करना सब विधि-कर्मोंमें श्रेष्ठ है और उसे भुला देना निषेध-कर्मोंमें सिरमौर है ॥२॥ राम-नाम महामणि है और जगजाल सर्प है। सर्पकी मणि ले लेनेपर क्या वह व्याकुल और विहाल सर्प जीवित रह सकता है ? (कदापि नहीं) तात्पर्य यह कि जिस प्रकार मणि ले लेनेपर सर्प मर जाता है, उसी प्रकार राम-नामरूपी मणि अपना लेनेसे सांसारिक कष्टरूपी सर्प मृतवत् हो जाता है ॥३॥ रामका नाम चारों फल देनेवाला कल्पवृक्ष है; सारांश, कल्पवृक्ष केवल अर्थ, धर्म और काम तीन ही फल देता है—मोक्ष नहीं देता; पर राम-नाम-रूपी कल्पतरु चारों फल देता है; इस बातको वेद, पुराण, पण्डित और शिवजी कहते हैं ॥४॥ राम-नाम, प्रेम यानी भक्ति और परमार्थका सार है। राम-नाम ही तुलसीदास के जीवनका आधार ॥५॥ विशेष १—'विधि'—शास्त्रोंमें विधि और निषेध दो तरहका कर्म बतलाया गया है; उन्हीं दोनों कर्मोंकी यहाँ चर्चा की गयी है। २—'जीवन अधार'—रामका नाम ही तुलसीदासके जीवनका आधार है।

विनय-पत्रिका १४७ अभिप्राय यह कि नामके ही प्रभावसे तुलसीदासको इहलोकमें मुट्ठीभर अन्न मिल रहा है। उन्होंने स्वयं ही कहा है:— 'नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ । इस नामके प्रभावसे अलौकिकके सिवाय पारलौकिक सिद्धि भी हो जाती है। कहा भी है:— सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोकलाहु पर-लोक निबाहू ॥ ( ६८ ) राम राम राम जीह जौ लौं तू न जपिहै। तौ लौं, तू कहूँ जाय, तिहूँ ताप तपिहै ॥१॥ सुरसरि-तीर बिनु नीर दुख पाइहै। सुरतरु तरे तोहि दारिद सताइहै ॥२॥ जागत, बागत, सपने न सुख सोइहै। जनम-जनम, जुग जुग जग रोइहै ॥३॥ छूटिबे के जतन विसेष बाँधौ जायगो। ह्वै है विष भोजन को सुधा-सानि खायगो ॥४॥ तुलसी तिलोक, तिहूँ काल तोसे दीनको। राम नाम ही की गति जैसे जल मीनको ॥५॥ शब्दार्थ—लौ = तक। सुरसरि = गंगाजी। सुरतरु = कल्पवृक्ष। बागत = फिरते हुए। सानि = मिलाकर। तिहूँकाल = तीनों काल, भूत, वर्तमान और भविष्य। मीन = मछली। भावार्थ—जबतक तू जीभसे राम-नाम नहीं जपेगा, तबतक तू कहीं भी जा,—तीनों तापोंसे तपता ही रहेगा ॥१॥ तबतक तू गंगाजीके तटपर रहकर भी बिना पानीके दुख पाता रहेगा और कल्पवृक्षके नीचे पहुँचनेपर भी तुझे दरिद्रता सताती रहेगी ॥२॥ जागते, चलते, सोते और स्वप्नमें भी तुझे सुख नहीं मिलेगा और जन्म-जन्म, युग-युग इस संसारमें रोता रहेगा ॥३॥ ज्यों-ज्यों तू अपनेको छुड़ानेके लिए यत्न करेगा, त्यों-त्यों अधिक कसकर बाँधा जायगा। उस दशामें तू जो भोजनकी सामग्री अमृतमें सानकर खायगा, वह भी तेरे लिए विष हो जायगा ॥४॥ ऐ तुलसीदास ! त्रिलोकमें तेरे जैसा दीन कौन हुआ,

१४८ विनय-पत्रिका कौन है अथवा कौन होगा ? बस, जैसे मछलीके लिए जल ही आधार है, उसी प्रकार तुझे केवल राम-नामका ही भरोसा है ॥५॥ विशेष १—'तिलोक तिहूँकाल'—पर गुसाईंजीने कहा है:— चहुँ जुग तीन काल तिहुँ लोका । भये नाम जपि जीव बिसोका ॥ बेद पुरान संत मत एहू । सकल सुकृत फल राम-सनेहू ॥ ( ६९ ) सुमिरु सनेह सों तू नाम रामराय को। संबल निसंबल को, सखा असहाय को ॥१॥ भाग है अभागेहू को, गुन गुनहीन को। गाहक गरीब को, दयालु दानि दीन को ॥२॥ कुल अकुलीन को, सुन्यो है बेद साखि है। पाँगुरे को हाथ-पाँय, आँधरे को आँखि है ॥३॥ माय बाप भूखे को, अधार निराधार को। सेतु भव-सागर को, हेतु सुखसार को ॥४॥ पतित पावन राम-नाम सो न दूसरो। सुमिरि सुभूमि भयो तुलसी सो ऊसरो ॥५॥ शब्दार्थ—अकुलीन = कुलहीन, नीच कुलवाला। पाँगुरे = पंगु, लँगड़े-लूले। सुखसार = सुखका सार, ब्रह्मानन्द। सुभूमि = सुन्दर भूमि, उपजाऊ भूमि। ऊसरो = ऊसर। भावार्थ—हे जीव ! तू स्नेहसे महाराज रामचन्द्रजीके नामका स्मरण कर। उनका नाम (भक्ति-मार्गपर जानेवालोंमें) जिनके पास मार्गव्यय नहीं है, उनके लिए मार्गव्यय या सहारा है और असहायका सखा है ॥१॥ राम-नाम अभागेका भाग्य और मूर्खोंका गुण है, वह गरीबका ग्राहक और दीनोंके लिए दयालु दानी है ॥ २ ॥ वह अकुलीनका कुल है, यह मैंने सुना है और वेद भी इस बातके साक्षी हैं। वह लँगड़े-लूलेका हाथ-पैर तथा अन्धोंकी आँख है ॥३॥ राम-नाम भूखोंका माई-बाप, निराधारका आधार, भवसागरका पुल और ब्रह्मानन्दका

विनय-पत्रिका १४९ कारण है ॥४॥ पतितोंको पवित्र करनेके लिए राम-नामकी तरह दूसरा कुछ भी नहीं है। राम-नामके स्मरणसे ही तुलसीदासके समान ऊसर उपजाऊ भूमि बन गया ॥५॥ विशेष १—'कुल······साखि'—ठीक ही है, भगवद्भक्तोंकी कुलीनता या अकु- लीनताको कौन पूछता है ? रामभक्तोंका तो कुल ही न्यारा है; उस कुलमें अकुलीन भी वैसे ही कुलीन हैं जिस प्रकार कुलीन । भगवान्‌की दृष्टिमें भेदभाव नहीं । देखिये न, युधिष्ठिरके यज्ञमें जबतक श्वपच (चांडाल) नहीं आया, तबतक परमात्माका पांचजन्य शंख बजा ही नहीं । सत्य है:— जाति-पाँति पूछै नहिं कोई । हरिको भजै सो हरि को होई ॥ २—'पतित पावन राम-नाम'—इसके लिए इतना कहना पर्याप्त है । सबरी गीध सुसेवकनि, सुगति दीन्हि रघुनाथं । नाम उधारे अमित खल, वेद-विदित गुनगाथ ॥ ✕ ✕ ✕ अघत अजामिल गज गनिक़ाऊ । भये मुकुत हरि-नाम-प्रभाऊ ॥ ( ७० ) भलो भली भाँति है जो मेरे कहे लागिहै मन राम नाम साँ सुभाय अनुरागिहै ॥१॥ राम नामको प्रभाउ जानि जूड़ी आगि है । सहित सहाय कलिकाल भीरु भागिहै ॥२॥ राम-नाम साँ बिराग, जोग, जप जागिहै । वामविधि भाल हू न करम दाग दागिहै ॥३॥ राम-नाम मोदक सनेह सुधा पागिहै । पाइ परितोष तू न द्वार द्वार वागिहै ॥४॥ राम-नाम काम-तरु जोइ जोइ माँगिहै। तुलसिदास स्वारथ परमारथ न खाँगिहै ॥५॥

४. श्री लक्ष्मण, भरत व सीता स्तुति

१५० विनय-पत्रिका शब्दार्थ-जूड़ी = कँपाकर आनेवाला ज्वर। सहाय = सेना। भीरु = डरपोक। वाम = प्रतिकूल। दाग = अङ्क। दागिहै = लिख सकेंगे। बागिहै = घूमेगा। खाँगिहै = घटेगा। भावार्थ-रे मन! यदि तू मेरे कहेपर चलकर स्वभावसे ही राम-नामसे प्रेम करेगा, तो तेरा हर तरहसे भला होगा ॥१॥ तू यह जान ले कि जैसे गुड़गुड़ी देकर आनेवाले ज्वरके लिए आग है, उसी प्रकार सेना-सहित डरपोंक कलिकाल- के लिए रामनामका प्रभाव है। नामके प्रभावसे कलिकाल भाग जायगा ॥२॥ राम-नामके प्रभावसे वैराग्य, योग, जप आदि जाग्रत् हो जायेंगे, और ब्रह्मा प्रतिकूल रहनेपर भी ललाटको कर्मरूप दागसे न दाग सकेंगे ॥३॥ यदि तू राम- नामरूपी मोदकको प्रेम-सुधामें पागेगा अर्थात् पकावेगा, तो तू सन्तोष प्राप्त करके द्वार-द्वार न घूमेगा ॥४॥ राम-नाम कल्पवृक्ष है, उससे तू जो-जो वस्तु माँगेगा, सब पायेगा। ऐ तुलसीदास, उससे न तो तुझे स्वार्थकी ही कमी रहेगी और न परमार्थकी ही ॥५॥ विशेष १- 'जूड़ी आगि है-' इसके कई अर्थ हो सकते हैं। राम-नामका प्रभाव सर्दी दूर करनेके लिए अग्निके समान है; अथवा नामके प्रभावसे आग भी ठण्डी जान पड़ेगी; या नामके प्रभावको शीतल अग्नि जानकर (तात्पर्य यह कि राम- नामके प्रभावमें कहने या देखनेमें तो किसी प्रकारका ताप प्रतीत नहीं होता, पर नामके आश्रित जीवको यदि कोई बाधाएँ ग्रहण करती हैं तो वे जलकर भस्म हो जाती हैं; जैसे पाला शीतल प्रतीत होता है, किन्तु लताओं और वृक्षोंको झुलस देता है, उसी प्रकार राम-नाम सबके लिए शीतल है, किन्तु कलिकालके लिए अग्निरूप है।) कलिकाल भाग जायगा। २- 'न करम दाग दागिहै' - अर्थात् नामके प्रभावसे सब कर्म क्षीण हो जायेंगे। कहा भी है- 'मेटत कठिन कुअंक भालके।' अथवा- 'भाविउ मेटि सकहिं 'त्रिपुरारी'। -रामचरितमानस

विनय-पत्रिका १५१ ७१ ) ऐसेहुँ साहब की सेवा सों होत चोर रे । अपनी न बूझ, न कहै को राँडरार रे ॥१॥ मुनि-मन-अगम, सुगम माइ-बापु सो। कृपासिन्धु, सहज सखा, सनेही आपु सो ॥२॥ लोक-वेद-विदित बड़ो न रघुनाथ सो। सब दिन सब देस, सबहि के साथ सो ॥३॥ स्वामी सर्वग्य सों चलै न चोरी चार की। प्रीति पहिचानि यह रीति दरवार की ॥४॥ काय न कलेस-लेस, लेत मानि मन की। सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत जन की ॥५॥ रीझे बस होत, खीझे देत निज धाम रे। फलत सकल फल कामतरु-नाम रे ॥६॥ बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखै काम रे। सोऊ तुलसी निवाज्यो ऐसो राजाराम रे ॥७॥ शब्दार्थ—राँडरौर = राँड़ोंकी आवाज। चार = सेवक, दूत। जोगवत = बचाते हैं, रखते हैं। खीझे = नाराज होनेपर। निवाज्यो = निहाल किया। भावार्थ—रे मन ! तू ऐसे भी स्वामीकी सेवा करनेसे जी चुरा रहा है! न तो तुझमें अपना हित पहचाननेकी समझ है और न किसीके कहनेका ही तुझपर कुछ असर पड़ता है। तू बिलकुल ही निकम्मा है ॥१॥ वह मुनियोंके मनके लिए भी अगम और भक्तोंके लिए माँ-बापकी तरह सुगम हैं। वह कृपाके समुद्र हैं, सहज सखा हैं और स्वभावतः स्नेही हैं ॥२॥ लोक और वेदमें यह बात प्रकट है कि रघुनाथजीसे बड़ा कोई नहीं है। वह सर्वदा (भूत, वर्तमान, भविष्य) सर्वत्र (स्वर्ग और नरक) और सबके साथ रहते हैं ॥३॥ सर्वज्ञ स्वामीसे सेवककी चोरी नहीं चलती। उनके दरबारकी यह रीति है कि केवल प्रेमकी ही पहचान की जाती है ॥४॥ उनकी सेवामें शरीरको रंचमात्र भी क्लेश नहीं होता। वह मनकी भावनाको ही मान लेते हैं। स्मरण करनेपर वह ससंकोच भक्तोंकी रुचि रखते हैं। सारांश, भक्तकी रुचिके अनुसार बड़ीसे बड़ी वस्तु दे डालनेपर भी

१५२ विनय-पत्रिका संकोच करते हैं कि कुछ नहीं दिया ॥५॥ वह रीझनेपर वशीभूत हो जाते हैं (जैसे हनुमान्जीपर रीझकर उनके वशीभूत हुए थे) और खीझनेपर मुक्ति (निज धाम) देते हैं (जैसे रावण, बालि आदिको)। कल्पवृक्ष-सदृश जो राम-नाम है, वह सब फल फलता है ॥६॥ जिसे (तुलसीदासको) न तो बेचनेपर फूटी कौड़ी मिल सकती है और न रखनेसे कोई काम ही निकल सकता है, उस तुलसीदासको भी निहाल कर दिया—ऐसे महाराज रामचन्द्रजी हैं ॥७॥ विशेष १—'मुनि-मन.......बापु सो'—श्रीरामजी अगम भी हैं और सुगम भी। अगम तो ऐसे हैं कि मुनियोंके ध्यानमें भी नहीं आते, और सुगम भी इस कदर हैं कि अवधवासियों और ब्रजवासियोंको हर समय दर्शन दिया करते हैं। जैसे माता-पिता अपने बच्चोंकी शुश्रूषा करनेमें सदैव लगे रहते हैं, उसी प्रकार भगवान् भी अपने भक्तोंके पीछे-पीछे रहा करते हैं। २—'सनेही आपु सो'--वह किसी भी समयमें किसी जीवको नहीं भूलते। गर्भ सरीखे निषिद्ध स्थानमें भी परमात्मा प्रत्येक प्राणीका पालन करते हैं। ३—'सकल फल'—कल्पवृक्ष तीन फल देता है, पर राम-नाम चारों फल। इसीसे 'सकल फल' लिखा गया है। ७२ ) मेरो भलो कियो राम आपनी भलाई। हौं तो साईं-द्रोही पै सेवक हित साईं ॥१॥ राम सों बड़ो है कौन, मो सों कौन छोटो। राम सों खरो है कौन, मो सों कौन खोटो ॥२॥ लोक कहै रामको गुलाम हौं कहावों। एतो बड़ो अपराध भो न मन बावों ॥३॥ पाथ माथे चढ़े तृन तुलसी ज्यों नीचो। बोरत न बारि ताहि जानि आपु सींचो ॥४॥ शब्दार्थ—द्रोही = शत्रु। पै = पर। भो = हुआ। बावों = बाम, टेढ़ा। पाथ = जल।

विनय-पत्रिका १५३ भावार्थ—श्रीरामजीने अपनी भलाईके लिए (अपना बाना रखनेके लिए) मेरा भला कर दिया। मैं तो स्वामीका शत्रु हूँ, पर स्वामी श्रीरामजी सेवकके हितू हैं ॥१॥ भला श्रीरामजीसे बड़ा कौन है, और मुझसे छोटा कौन है ? रामजीके समान कौन खरा है और मुझ-सा कौन खोटा है ? ॥२॥ संसार कहता है कि मैं रामजीका गुलाम हूँ; (किन्तु वह तब कहता है जब) मैं ऐसा कहलवाता हूँ। मुझसे इतना बड़ा अपराध हुआ, तो भी श्रीरामजीका मन मेरी ओरसे बाम नहीं हुआ ॥३॥ हे तुलसी ! यह बात ठीक वैसी ही है, जैसे नीच तृण (तिनका) जलके मस्तकपर चढ़ जाता है, फिर भी जल यह जानकर उसे नहीं डुबोता कि उसने उसे सींचा है या पाला-पोसा है ॥४॥ विशेष १—'साईं-द्रोही'—कहनेका यह आशय है कि तुच्छ और बुरा होनेपर भी जो मैं अपनेको श्रीरामजीका गुलाम कहलवाता हूँ, उससे श्रीरामजीकी बदनामी होगी; क्योंकि श्रीरामजीके सेवकको संसार बहुत उच्च दृष्टिसे देखता है, पर मेरे जैसे अकिंचनको देखकर लोगोंकी क्या धारणा होगी ? भला यह स्वामीके द्रोहीका काम नहीं तो और किसका है ? २—'नीचो'--जलसे ही तृण उत्पन्न होता है और समय पाकर वह उसके माथेपर चढ़ जाता है। जन्मदाताके मस्तकपर चढ़ना घोर नीचता है। इसीसे ग्रन्थकारने 'नीचो' शब्द लिखा है। ३—'पाथ······सींचो'—यह चरण बड़ा सरस है। एक ओर जल हूँ और दूसरी ओर कृपा । आह ! धन्य हैं गोस्वामीजी ! [ ७३ ] जागु, जागु, जीव जड़ ! जोहै जग-जामिनी । देह-गेह-नेह जानि जैसे घन-दामिनी ॥१॥ सोवत सपनेहुँ सहै संसृति-संताप रे । बूड्यो मृग-वारि खायो जेवरी को साँप रे ॥२॥ कहँहिं वेद बुध, तू तो बूझि मन माँहिं रे । दोष-दुख सपने के जागे ही पै जाहिं रे ॥३॥

१५४ विनय-पत्रिका तुलसी जागे ते जाय ताप तिहूँ ताय रे । राम-नाम सुचि रुचि सहज सुभाय रे ॥४॥ शब्दार्थ—नेह = स्नेह । दामिनी = बिजली । संसृति = संसार । बुध = पण्डित । भावार्थ—ऐ जड़ जीव ! जाग, जाग; और संसाररूपी रात्रिको देख; अर्थात् सांसारिक अविद्या या मोहको समझ । यह जान ले कि देह और घरका स्नेह मानो बादलोंके बीचकी बिजली है (जो जरा-सी देरके लिए कौंधकर गायब हो जाती है) । (यदि तू यह समझता हो कि जागनेपर कष्टका ही अनुभव होगा तो ) जो आदमी सो जाता है, वह स्वप्नमें ही मृगजालमें डूबा, रस्सीके साँपसे डस लिया, इस प्रकार संसारका सन्ताप सहता है ॥२॥ चारों वेदों और पंडितोंका कथन है और तू भी अपने मनमें समझ ले कि स्वप्नके दोष और दुःख जागनेपर ही दूर होते हैं ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि दैहिक, दैविक और भौतिक इन तीनों तापोंके दुःख जागनेपर ही जाते हैं और तभी राम-नाममें पवित्र प्रीति सहज स्वभावसे उत्पन्न होती है ॥४॥ विशेष १—‘जागु जागु’ इस विषयमें गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें कहा है:— ‘इहि जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथ एरपंच वियोगी ॥ २—‘मृगजाल’—यहाँ पुत्र, कलत्र, धन आदि ही मृगजल है । राग-विभास [ ७४ ] जानकीस की कृपा जगावती सुजान जीव, जागि त्यागि मूढ़ताऽनुरागु श्रीहरे । करि विचार, तजि विकार, भजु उदार रामचंद्र- भद्रसिंधु, दीनबंधु, वेद वदत रे ॥१॥ मोहमय कुहू-निसा विसाल काल विपुल सोयो, खोयो सो अनूप रूप स्वप्न जो परे ।