भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 148

मानो मेघपर तारागणकी मंडलीके बीचमें नवग्रहोंकी सभा बैठी हो। (यहाँ नीले मेघके समान भगवान्‌का शरीर है, तारा-मंडल गजमुक्ताकी माला है और उसके बीचमें पिरोये हुए रंग-बिरंगे रत्न नवग्रह हैं) ॥७॥ सर्पके शरीर जैसे भुजदंडोंमें कमल, शंख, चक्र और गदा शोभित हो रहे हैं। ग्रीवाकी सुन्दरतामें सौन्दर्यकी हद है। चिबुक, अधर तथा मुखपर अमित छवि छायी हुई है ॥८॥ दाँतोंको देखकर हीरे, कुन्दकी कलियों और बिजलीकी चमकको लज्जित होना पड़ता है। नासिका, नेत्र, कपोल, ललित कर्ण-कुंडल तथा भौंहें मुझे बहुत भाती हैं ॥९॥ सिरपर घुँघराले बालोंके ऊपर मुकुट है; माथेपर जो तिलक है उसे समझकर कहता हूँ, मानो बिजलीकी दो छोटी रेखाएँ चन्द्र-मंडल (मुख) में अपनी चंचलता छोड़कर बस रही हों ॥१०॥ स्वच्छ और उपमा-रहित पीताम्बरकी उपमा हृदयमें समाती ही नहीं, (तथापि यथाशक्ति कल्पना की जाती है) मानो बहुत-से मणियोंसे संयुक्त नीले पर्वत-शिखरपर सुनहला वस्त्र सुशोभित हो रहा हो ॥११॥ दाहिनी ओर प्रेम-सहित बैठी हुई लक्ष्मीजीसे शोभा और भी बढ़ गयी है। ऐसा जान पड़ता है मानो तमाल वृक्षके पास नीला वस्त्र ओढ़े स्वर्ण- लता बैठी हो ॥ सैकड़ों सरस्वती, शेष और वेद मिलकर इस शोभाका वर्णन करके समाप्त नहीं कर सकते, फिर भला द्वन्द्वरत तथा मूढ़बुद्धि तुलसीदास इस दिव्य शोभाका वर्णन किस प्रकार कर सकता है ॥१२॥

विशेष १—‘किसोर’—छःअवस्थाओंके अन्तर्गत एक अवस्था। वे छ अवस्थाएँ हैं:—१ शिशु, २ कौमार, ३ पौगंड, ४ किशोर, ५ यौवन, ६ जरा। ग्यारहसे पन्द्रह वर्षके भीतरकी अवस्थाको किशोरावस्था कहते हैं। पर यहाँ किशोरसे पन्द्रह वर्षकी अवस्था ही समझनी चाहिये। २—‘नीलकंज······दुति पाई’—में प्रतीप अलंकार है। प्रतीपका अर्थ है उलटा (प्रतिलोम्यात् प्रतीपं)। प्रतीपालंकारका यह लक्षण है:— प्रसिद्धस्योपमानस्योपमेयत्वप्रकल्पनम्। निष्फलत्वाभिधानं वा प्रतीपमिति कथ्यते ।—साहित्यदर्पणे । अर्थात् प्रसिद्ध उपमानको उपमेय बनाना या उसको निष्फल बतलाना