भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

१३८ विनय-पत्रिका प्रतीप अलंकार है। इसके पाँच भेद हैं। उनमें प्रथम प्रतीपका लक्षण काव्य- प्रभाकरमें इस प्रकार है:— सो प्रतीप उपमेय सम, जब कहिय उपमान। लोचनसे अम्बुज बने, मुखसों चन्द बखान ॥ अर्थात् जहाँ उपमानमें उपमेयकी कल्पना की जाय। जैसे 'नेत्रोंके समान कमल बने हैं और मुखके समान चन्द्रमा।' यहाँ नेत्र और मुख जो उपमेय हैं, वे उपमान हो गये हैं। प्रतीपके प्रथम भेदका एक उदाहरण और लीजिये :— “उतरि नहाये जमुन जल, जो सरीर-सम स्याम।” —रामचरितमानस । यहाँपर उक्त अलंकार ही है। ३—'अभूत उपमाई'—'अभूत उपमा' का लक्षण महाकवि केशवदासने इस प्रकार लिखा है:— उपमा जाय कही नहीं, जाको रूप निहारि। अस अभूत उपमा कही, केसवदास विचारि ॥ —कवि-प्रिया। वियोगि हरिजीने यहाँपर 'अद्भुत उपमाई' पाठ मानकर 'कुछ विचित्र ही उपमा' अर्थ किया है, पाठक ही विचार करें कि इन दोनोंमें कौन-सा पाठ और अर्थ ठीक है। ४—आगे 'अरुननील' आदि पंक्तियोंमें उत्प्रेक्षालंकार है। ५—'जनु हर-उर हरि' के स्थानपर कहीं-कहीं 'जनु हर-डर-हरि पाठ भी है। जहाँ ऐसा पाठ है वहाँ 'हरि' का अर्थ कामदेव होगा। मानो हरके डरसे कामदेवने नानारूप धारण करके श्रेष्ठ घर बना रखा है। अर्थात् कामदेवने अपनेको शिवजीका अपराधी समझकर यह स्थिर किया कि भगवान्के चरणोंकी शरणमें गये बिना और कहीं रक्षा नहीं हो सकती। इसीसे वह भगवान्के चरणोंके नूपुररूपी घरमें स्वरस्वरूप होकर घुस पड़ा है। ६—'उर बिसाल भृगुचरन'—एक बार भृगु ऋषिने क्रुद्ध होकर भगवान्के हृदयपर पदाघात किया था। अतः उनके पैरका चिह्न भगवान्के वक्षःस्थलपर अंकित हो गया।