विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १३९ ७—'नवग्रह'—सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र शनि, राहु और केतु ये नवग्रह हैं। प्रत्येक ग्रहका रंग भिन्न-भिन्न है; जैसे सूर्य और मंगलका रंग लाल, बृहस्पतिका पीला, शनि, राहु और केतुका काला, बुधका हरा तथा चन्द्रमा और शुक्रका श्वेत है। उसी प्रकार रत्न भी विभिन्न रंगके हैं। वियोगी हरिजीने अपनी टिप्पणीमें सूर्यका रंग श्वेत लिखा है। ऐसा उल्लेख उन्हें कहाँ मिला, कहा नहीं जा सकता। राग जयतिश्री ( ६३ ) मन इतनोई या तनुको परम फलु । 'सब अँग सुभग बिन्दुमाधव छबि, तजि सुभाव, अवलोकु एक फला॥१॥ तरुन अरुन अंबोज चरन मृदु, नख-द्युति हृदय-तिमिर-हारी । कुलिस-केतु-जव-जलज रेख वर, अंकुस मन-गज-बसकारी ॥२॥ कनक-जटित मनि नूपुर, मेखल, कटि-तट रटति मधुर बानी । त्रिवली उदर, गँभीर नाभि सर, जँह उपजे विरंचि ग्यानी ॥३॥ उर वनमाल, पदक अति सोभित, विप्र-चरन चित कहँ करषै । स्याम तामरस-दाम-वरन वपु, पीत बसन सोभा बरषै ॥४॥ कर कंकन केयूर मनोहर, देति मोद मुद्रिक न्यारी । गदा, कंज, दर, चारु चक्रधर, नाग-सुंड-सम भुज चारी ॥५॥ कंबु ग्रीव, छबिसीव चिवुक द्विज, अधर अरुन, उन्नत नासा । नव राजीव नयन ससि आनन, सेवक-सुखद बिसद हासा ॥६॥ रुचिर कपोल, श्रवन कुंडल, सिर मुकुट, सुतिलक भाल भ्राजै । ललित भृकुटि, सुंदर चितवनि, कच निरखि मधुप-अवली लाजै ॥७॥ रूप-सील-गुनखानि दच्छ दिसि, सिंधु सुता रत-पद सेवा । जाकी कृपा-कटाच्छ चहत सिव, बिधि, मुनि, मनुज, दनुज, देवा ॥८॥ १. 'सब अँग सुभग'के स्थानपर 'नख-सिख रुचिर' पाठ भी मिलता है।