भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 464

विनय-पत्रिका ४५३ देह-जीव-जोग के सखा मृषा टाँचन टाँचो। किये बिचार सार कदली ज्यों, मनि कनक संग लघु लसत बीच बिच काँचो ॥२॥ 'विनय-पत्रिका' दीन की, बापु ! आपु ही बाँचो। हिये हेरि तुलसी लिखी, सो सुभाय सही करि बहुरि पूँछिये पाँचो ॥३॥ शब्दार्थ—विसेषि = विशेष, बड़ा। टाँचन = टाँचोंसे। टाँचो = टाँच दीजिये, डाट दीजिये। कनक = सुवर्ण। लसत = शोभा देता है। पाँचो = पंचोंसे। भावार्थ—हे महाराज रामचन्द्र ! आपके सिवा मेरा सच्चा हितकारी और कौन है ? मैं सुन-समझकर सब लोगोंसे, यहाँतक कि आपसे भी कहता हूँ कि यदि कोई आपसे भी बड़ा हो तो दूसरी लकीर खींच दीजिये (मेरी बात काट दीजिये) ॥१॥ शरीर और जीव-संयोगके जितने मित्र हैं, सब मिथ्यारूपी टाँकोंसे सिले हैं। विचार करनेपर मालूम होता है कि ये सखा केलेके सारकी तरह (निस्सार) हैं; अर्थात् जैसे ऊपरसे देखनेमें मालूम होता है कि केलेके तनेके भीतर गूदा है, किन्तु छीलनेपर छिलकेके सिवा और कुछ नहीं निकलता, वैसे ही ये सांसारिक सम्बन्धी भी हैं। ये उसी तरह चमकते जान पड़ते हैं जैसे मणि- सुवर्णके छोटे-छोटे बीच-बीचमें छोटासा काँच (जिनका कोई मूल्य नहीं है) ॥२॥ हे पिताजी ! इस दीनकी 'विनय-पत्रिका' आप ही पढ़िये, (दूसरेसे पढ़वाकर न सुनिये)। तुलसीने इसे अपने हृदयसे विचारकर लिखा है, इसपर पहले आप अपने स्वभावसे सही कर दीजिये, फिर पंचोंसे (दरबारियोंसे) पूछिये ॥३॥ विशेष १—'देह-जीव-जोग'—वास्तवमें यह शरीर मिथ्या है। और शरीर- जीवका सम्बन्ध भी मिथ्या है। बालिकी स्त्री ताराको समझाते हुए भगवान्‌ने इस शरीर और जीवके सम्बन्धमें कहा है— छिति जल-पावक-गगन-समीरा। पंच-रचित अति अधम सरीरा ॥ प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य तुम केहि लगि रोबा ॥ —रामचरित मानस