भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 465

४५४ विनय-पत्रिका क्योंकि यह जीव निःसंग है, अविनाशी है। देखिये— ईस्वर-अंश जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुख-रासी ॥ गीतामें भी कहा है:— अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ अतः जब अविनाशी जीवका नाशवान् शरीरके साथ मेल होना ही मिथ्या है, तो फिर उसके साथ सम्बन्ध रखनेवाले कैसे मिथ्या न होंगे ? यहाँ दुर्लभ मनुष्य-शरीरकी उपमा सुवर्णसे दी गयी है, जीवकी उपमा मणिसे, और देह- जीव-जोगके सम्बन्धियोंकी उपमा काँचसे दी गयी है। खूब ! यहाँ मन-सहित बाह्येन्द्रियाँ, तथा स्त्री-पुत्र, सगे-सम्बन्धी आदि ही 'देह-जीव-जोगके सखा' हैं। २—'पाँचों'...पंचों; सब पञ्चोंका नाम गुसाईंजीने आगेके पदमें गिना दिया है। अर्थात् हनुमान्जी, शत्रुघ्नजी, भरतजी और लक्ष्मणजी । चार ये, और एक जगजननी जानकी-सहित स्वयं महाराज रामचन्द्रजी । [ २७८ ] पवन-सुवन ! रिपु-दवन ! भरतलाल ! लखन ! दीन की । निज निज अवसर सुधि किये, बलि जाउँ, दास-आस पूजि है खास खीन की ॥१॥ राज-द्वार भली सब कहैं साधु-समीचीन की । सुकृत-सुजस, साहिब-कृपा, स्वारथ-परमारथ, गति भये गति-विहीन की ॥२॥ समय सँभारि सुधारिवी तुलसी मलीन की । प्रीति-रीति समुझाइवी नतपाल कृपालुहि परमिति पराधीन की ॥३॥ शब्दार्थ—खीन = क्षीण, खिन्न । समीचीन = अच्छे, सच्चे । परमिति = सीमा । भावार्थ—हे पवनकुमार ! हे शत्रुघ्नजी ! हे भरतलाल ! हे लखनलाल ! मैं आप लोगोंकी बलैया लेता हूँ, यदि आप लोग अपने-अपने अवसरपर इस दीनकी सुध करेंगे, तो इस निहायत खिन्न दासकी आशा पूरी हो जायगी ॥१॥