विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४५५ राजदरबारमें अच्छे साधुको तो सभी अच्छा कहते हैं, किन्तु यदि आप लोग इस अशरण दीनवाली कह देंगे तो आप लोग पुण्य और यशके भागी होंगे, प्रभुजी- की आप लोगोंपर कृपा होगी (क्योंकि उन्हें अपने बानेकी लाज रखनेके लिए पतितोंकी सदैव आवश्यकता रहा करती है) तथा स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही आप लोगोंके बन जायेंगे ॥२॥ इसलिए आप लोग समय देखकर इस पापी तुलसीकी बात सुधार दीजियेगा । शरणागत-वत्सल कृपालु श्रीरामजीसे इस पराधीन (तुलसी)के प्रेमकी रीतिकी हदको समझा दीजियेगा ॥३॥ विशेष १—‘पवन-कुमार...लखन’—यहाँ गुसांईजीने क्रमसे सबको सम्बोधन किया है । दरबारमें जिस क्रमसे यह ‘विनय-पत्रिका’ महाराजतक पहुँच सकती है, उसी क्रमसे सम्बोधन किया गया है । खूब ! महाराजके दरबारमें गुसाईं- जीको सबसे बड़ा भरोसा हनुमान्जीका है, क्योंकि उनकी इनपर विशेष कृपा है; इसलिए उन्होंने सबसे पहले हनुमान्जीको सम्बोधन किया है, और लक्ष्मण- जी रामजीके अधिक मुँहलगू हैं, गोस्वामीजीकी दृढ़ धारणा है कि और लोग सम्भवतः सङ्कोचवश मेरी बात श्रीरघुनाथजीसे कहनेका साहस न करेंगे, पर लखनलाल बिना किसी तरहकी हिचकिचाहटके कह देंगे; अतः सबके अन्तमें श्री लखनलालको सम्बोधन किया गया है । आगेके पदमें यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है । २—‘पराधीन’—कलिके अधीन होना घोर दुःखदायी है । कलिमें राम- नामके सिवा और किसी तरहका भी साधन सिद्ध नहीं हो सकता । यही कारण है कि शिवजीने कलिमें अन्य सब साधनोंका निषेध किया है । जरा कलिकी अवस्था देखिये— आयाते पापिनि कलौ सर्वधर्मविलोपिनी । दुराचारे दुष्प्रपञ्चे दुष्टकर्मप्रवर्त्तके ॥ न वेदा प्रभवस्तत्र स्मृतीनां स्मरणं कुतः । तदा लोको भविष्यन्ति धर्मकर्मबहिर्मुखाः ॥ उच्छृंखला मदोन्मत्ताः पापकर्मरताः सदा । कामुका लोलुपाः क्रूरा निष्ठुरा दुर्मुखाः शठाः ॥