विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 467, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें४५६ विनय-पत्रिका स्वल्पायुर्मन्दमतयो रोगशोकसमाकुलाः । निःस्वीका निर्बला नीचा नीचाचारपरायणाः ॥ नीचसंसर्गनिरताः परवित्तापहारकाः । परनिन्दापरद्रोहपरिवादपराः खलाः ॥ परस्त्रीहरणे पाप शंकाभयविवर्जितः । निर्धना मलिना दीना दरिद्राश्चिररोगिणः ॥ विप्राः शूद्रसमाचाराः सन्ध्यावन्दनवर्जिताः ॥ ✕ ✕ ✕ निर्वीर्याःश्रौतजातीया विषहीनोरगा इव । नीचेके पदका अर्थ है 'समस्त वैदिक मंत्र विषहीन सर्पके समान निर्वीर्य हो गये हैं।' जब कि कलियुगका यह स्वाभाविक धर्म है, तो फिर भला जीवके लिए इससे बढ़कर पराधीनता और क्या हो सकती है ? श्रीमद्भागवतमें भी कलियुगका बृहद् रूपसे वर्णन किया गया है। [ २७९ ] मारुति-मन, रुचि भरतकी लखि लषन कही है। कलिकालहु नाथ ! नाम सों परतीति- प्रीति एक किंकर की निवही है ॥१॥ सकल सभा सुनि लै उठी, जानी रीति रही है। कृपा गरीवनिवाज की, देखत गरीब को साहब बाँह गही है ॥२॥ बिहँसि राम कह्यो 'सत्य है, सुधि मैं हूँ लही है'। मुदित माथ नावत, वनी तुलसी अनाथ की, परी रघुनाथ१ सही है ॥३॥ शब्दार्थ—मारुति = हनुमान्जी । लखि = देखकर । लही = पायी, मिली । भावार्थ—हनुमान्जीका मन और भरतजीकी रुचि देखकर लक्ष्मणजीने भगवान्से कहा कि हे नाथ ! इस कलिकालमें भी आपके एक दासकी आपके नामके प्रति प्रतीति और प्रीति निभ गयी (देखिये, उसकी पत्रिका भी आयी है) १. पाठान्तर 'रघुनाथ हाथ' ।