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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 468, कुल 475 में से

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पृष्ठ 468

विनय-पत्रिका ४५७ ॥१॥ यह सुनकर सारी सभा कह उठी कि हाँ, हम लोग भी उस दासकी रीति जानते हैं (यह बात सर्वथा सत्य है)। यह सब गरीब-निवाज प्रभुकी कृपा है। स्वामीने सबके देखते-देखते उसकी बाँह पकड़ ली है—अपना लिया है ॥२॥ श्रीरामचन्द्रजीने मुसकराकर कहा कि, 'हाँ सत्य है ! मुझे भी उसकी खबर मिली है'। फिर क्या था, (स्वामीके मुखसे इतना शब्द निकलते ही) अनाथ तुलसी- दासकी बन गयी। उसके प्रफुल्लित होकर माथा झुकाते (प्रणाम करते) ही श्रीरघुनाथजीने (उसकी विनय-पत्रिकापर) सही कर दी—हस्ताक्षर कर दिया ॥३॥ विशेष १—‘मारुति······कही है’—सभामें श्रीजनकनन्दिनीजीके सहित भग- वान् राज्यसिंहासनपर विराजमान हैं। लक्ष्मणजीको हनुमान्‌जीकी अभिलाषा और भरतलालकी रुचि मालूम हो गयी। वह ढीठ तो थे ही, अच्छा अवसर देखकर तुलसीदासकी चर्चा कर बैठे। इस चरणमें गोस्वामीजीने ‘मारुति’ के लिए ‘मन’ और भरतके लिए ‘रुचि’ शब्द लिखा है। धन्य गोस्वामीजी ! शब्दोंका ठीक-ठीक वजन आपहीको मालूम था। ‘मन’ शब्द अत्यधिक उत्कंठा- का द्योतक है, और ‘रुचि’ शब्दमें स्वामित्वका आभास है; क्योंकि भरत आदि भाई भगवान्‌के ही अंश हैं। लिखा भी है— अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुख-दाता ॥ अथवा— अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेइहउँ दिनकर-बंस-उदारा ॥ —रामचरितमानस २—‘कृपा गरीब-निवाजकी’—सही है। बिना भगवत्कृपाके भक्ति-भाव पैदा नहीं होता, यह उल्लेख अन्यत्र भी पाया जाता है। सुग्रीवने कहा है— यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई ॥ अथवा बालकाण्डमें भी लिखा है— आवत एहि सर अति कठिनाई। रामकृपा बिनु आइ न जाई। ३—‘बिहँसि’—पीछे कहा जा चुका है कि किसी रहस्यपूर्ण बातपर ही भगवान्‌के हँसने या मुसकरानेका उल्लेख पाया जाता है। यथा—

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