विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ विनय-पत्रिका सुनि विराग-संजुत कपि-बानी । बोले बिहँसि राम धनुपानी ॥ ✕ ✕ ✕ सुनि केवटके बैन, प्रेम लपेटे अटपटे । बिहँसे करुनाऐन, चितइ जानकी लषन तनु ॥ ✕ ✕ ✕ सुनि अस उक्ति पवन-सुत केरी । बिहँसे रघुपति कपितन हेरी ॥ ✕ ✕ ✕ तब रघुपति बोले मुसुकाई । इसलिए यहाँ भी भगवान्के मुसकरानेका कुछ-न-कुछ कारण अवश्य है। यहाँ रामजीके मुसकरानेके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं— क—हनुमान्जी और भरतजीने मुझसे कहनेका साहस नहीं किया, अन्त- र्यामी भगवान्को यह बात मालूम हो गयी। इसलिए इस रहस्यको समझकर वह हँस पड़े। ख—एक तो तुलसीदासकी बात अन्तर्यामी भगवान् श्रीरामजीको स्वयं ही मालूम थी, दूसरे महारानीजी भी उसकी चर्चा कर चुकी थीं। क्योंकि गुसाईंजी उनसे पहले ही विनय कर चुके थे— कबहुँक अंब ! अवसर पाइ । मेरिऔ सुधि दाइबी कछु करुन कथा चलाइ ॥ इसलिए महाराजको हँसी आ गयी कि देखो ये लोग ऐसा कह रहे हैं मानो मैं तुलसीके सम्बन्धमें कुछ जानता ही नहीं। ग—गोस्वामीजीने भगवान्की कृपा प्राप्त करनेके लिए कोई भी उपाय नहीं छोड़ा था। रूठकर, खीझकर, नम्रता-पूर्ण विनय करके, सामर्थ्य- की याद दिलाकर, बदनामीका भय दिखाकर—हर प्रकारसे कहा है। उनके हृदयकी अधीरता भी बहुत बढ़ गयी थी। इसलिए गोस्वाजी- नीके चातुर्यका स्मरण करके भगवान् मुसकरा उठे ।