विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,001 पृष्ठ
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| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ११५ | शरीरविषयवर्णनम् ... ... ... | २५६ | २ | १३१ | यतिधर्मनिरूपणम् ... ... | .... | २७५ |
| ११६ | विविधदानकर्तॄणां धर्ममाचरतां च जीवोत्क्रमणानन्तरं ससुखं यमपुरे गमनं तद्विरुद्धानां तत्र विविधयातनासहनम् .... | २५८ | २ | १३२ | सर्वशान्तिसाधारणीशान्तिविधिः .... ... | .... | २७६ |
| ११७ | स्ववर्णाश्रमधर्ममनुरुन्धतां स्वर्गवासः ... | २५९ | २ | १३३ | भौमान्तरिक्षादिशान्तिषु, अद्भुताभ्यादि शान्तिकथनम् | .... | २७७ |
| ११८ | शास्त्रोक्तविरुद्धवर्णाश्रमधर्मकारिणां निरयगमनम् ... | २६० | १ | १३४ | विविधोत्पातकथनम् ... | .... | २७८ |
| ११९ | विविधनरकनामप्रदर्शनपूर्वकं पापिनां तेषुतेषु नरकेषु यातना वर्णनम् | २६१ | २ | १३५ | अथाविकारोपशमनवर्णनम् ... ... | .... | २७९ |
| १२० | पापकर्मानुसारं नारकयातना अनुभूय नारकाणां संसारे ब्रह्मराक्षसतिर्यगादिगोनुषु जन्म ... ... | २६२ | १ | १३६ | औत्पातिकशान्तिवर्णनम् ... ... | .... | ” |
| १२१ | नरकवेदनाभोगानन्तरं मणिमुक्तादिहर्तुः स्वर्णकाजातो, स्वर्णचोरस्य कुनखित्वं, सुरापस्य कृष्णदन्तता, गुरुप्रतिकूलस्यापस्मारित्वादिकपूर्वजन्म कर्मप्रकाशकविद्युक्तवपुस्त्वम् ... ... | ” | २ | १३७ | औत्पातिके वृक्षविकृत्यवर्णनम् ... ... | .... | ” |
| १२२ | वर्णाश्रमधर्मकारिणां भीत्यभावः (दुर्गतिितरणम्) ... | २६३ | १ | १३८ | ” वृष्टिविकृत्यवर्णनम् ... | .... | ” |
| १२३ | सर्वपापनाशक चान्द्रायणकृच्छ्रादिवर्णनम् ... | ” | २ | १३९ | ” जलवैकृत्यवर्णनम् ... | .... | २८० |
| १२४ | विविधपापनाशकनानाद्रव्य पूर्वक गोदानफलप्रदाने | २६५ | १ | १४० | कृमिस्रववर्णनम् ... ... | .... | ” |
| १२५ | वैदिकविहितमन्त्रैस्तत्तत्कार्यसाधक तन्त्रविधानम् ... | २६८ | २ | १४१ | वडवास्ति्यादिवसृमप्रसववैकृतादिशान्तिः | .... | ” |
| १२६ | अनेककामनासिद्धिकरसामप्रयोगकथनम् ... | २७१ | २ | १४२ | उपस्कवैकृतवर्णनम् ... | .... | ” |
| १२७ | अथर्वविहिनानेकप्रयोगसाधकविधिकथनम् ... | २७२ | १ | १४३ | आप्रव्यथ्याम्पश्व्वादीनां ग्रामारण्यगमनादिविकृतशान्तिः | .... | ” |
| १२८ | श्रीसूक्तमाहात्म्यकथनम् ... ... | २७४ | १ | १४४ | प्रसादादीनांगोनानांनिमितपतनं ग्रहादीनां विरुद्धापत्वे गुरुमित्रदेवीहार्दानामुदये च शान्तिः ... ... | .... | २८१ |
| १२९ | पुरुषसूक्तमाहात्म्यवर्णनम् ... ... | ” | २ | १४५ | राज्यमण्डलवर्णने कुल्यादिभेदेन शत्रूवर्णनम् ... | .... | ” |
| १३० | वानप्रस्थाश्रमधर्मकथनम् ... ... | २७५ | १ | १४६ | शत्रुपु दण्डप्रणायनम् ... ... | .... | ” |
| १४७ | युद्धकरणे हानि विचार्योपेक्षीकरणम् ... | .... | २८२ | ||||
| १४८ | शत्रुव्याकुलीकरणाय तद्राज्ये गुप्ताल्योत्पादादिकम् | .... | ” | ||||
| १४९ | इन्द्रजालेन शत्रुराज्ये चतुरङ्गबलवृद्धिच्छिङ्गानि दर्शनीयानि | .... | ” |